भारत की टेक कंपनियां AI को अपनाने की होड़ में हैं, लेकिन 'फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स' (FDE) की भारी कमी एक बड़ी चुनौती बन गई है। साल 2030 तक इन प्रोफेशनल्स की मांग **88%** तक बढ़ने की उम्मीद है, जबकि वर्तमान में केवल **1%** इंजीनियर्स ही इस भूमिका के लिए तैयार हैं, जिससे IT कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
AI एडॉप्शन में टैलेंट का संकट
भारत का टेक्नोलॉजी सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहाँ सामान्य सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से निकलकर स्पेशलाइज्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंटीग्रेशन पर फोकस बढ़ गया है। Scaler और CyberMedia Research की नई रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों को ऐसे 'फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स' (FDE) की जरूरत है जो टेक्निकल एक्सपर्ट होने के साथ-साथ क्लाइंट्स की समस्याओं को सीधे हल कर सकें।
हायरिंग की जंग और बढ़ती लागत
फिलहाल स्थिति यह है कि देश की 80% मल्टीनेशनल कंपनियां अगले एक साल में इन प्रोफेशनल्स को हायर करने की तैयारी में हैं। समस्या यह है कि 90% सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के पास इस भूमिका के लिए जरूरी ट्रेनिंग या क्लियर करियर पाथ की कमी है। ऐसे में जब टैलेंट कम और मांग ज्यादा होती है, तो कंपनियां उन्हें हायर करने के लिए भारी वेतन देती हैं, जिससे कंपनियों का खर्च बढ़ता है।
मार्जिन पर असर का जोखिम
निवेशकों के लिए यह एक चिंताजनक संकेत है। यदि IT कंपनियां अपने कर्मचारियों को समय रहते अपस्किल (Upskill) नहीं कर पाती हैं, तो उन्हें बाहर से महंगे टैलेंट को हायर करना पड़ेगा। इसका सीधा असर कंपनी के ऑपरेशनल कॉस्ट और अंततः नेट प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा। हालांकि 58% सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स इन रोल में जाने के इच्छुक हैं, लेकिन ट्रेनिंग के अभाव में वे चाहकर भी इस बदलाव का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि बड़ी IT फर्में अपने ट्रेनिंग बजट और हायरिंग स्ट्रैटेजी को कैसे मैनेज करती हैं ताकि मुनाफे को सुरक्षित रखा जा सके।
