Indian Indic AI Sector: भारतीय भाषा आधारित AI स्टार्टअप्स की धूम, अब तक जुटाए **$657 मिलियन**

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AuthorMehul Desai|Published at:
Indian Indic AI Sector: भारतीय भाषा आधारित AI स्टार्टअप्स की धूम, अब तक जुटाए **$657 मिलियन**

भारत के भाषाई AI स्टार्टअप्स ने अब तक **56** डील के जरिए **$657 मिलियन** की फंडिंग जुटाई है। साल **2026** में निवेश का रुख बड़े और केंद्रित राउंड्स की ओर बढ़ा है, लेकिन विदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता अभी भी एक बड़ा जोखिम बनी हुई है।

भारत का आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है, खासकर उन स्टार्टअप्स के लिए जो भारतीय भाषाओं (Indic Languages) पर केंद्रित हैं। साल 2021 से अब तक इस सेक्टर ने कुल $657 मिलियन की फंडिंग हासिल की है। डेटा के मुताबिक, पहले जहां यह निवेश कई छोटे-छोटे हिस्सों में बँटा हुआ था, वहीं 2026 में अब बड़े और कंसंट्रेटेड फंडिंग राउंड्स का ट्रेंड देखने को मिल रहा है। Sarvam AI इस दौड़ में सबसे आगे है, जिसने अपने सॉवरेन AI प्लेटफॉर्म के निर्माण के लिए इस साल मोटी पूंजी जुटाई है।

मार्केट के दो बड़े हिस्से

इस सेक्टर को फिलहाल दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला ग्रुप—जिसमें Sarvam, Gnani, Soket AI और BharatGen जैसे नाम शामिल हैं—कोर लैंग्वेज मॉडल और स्पीच ट्रांसलेशन पर काम कर रहा है। वहीं, दूसरा ग्रुप—जिसमें Skit.ai और GreyLabs शामिल हैं—इसका इस्तेमाल एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर समाधानों के लिए कर रहा है। GreyLabs की सफलता इस बात का प्रमाण है कि कैसे ये कंपनियां RBL Bank, AU Small Finance Bank और IDFC FIRST Bank जैसे वित्तीय संस्थानों को वॉइस AI सेवाएं दे रही हैं।

निजी निवेश बनाम सरकारी मॉडल

सिंगापुर के SEA-LION या सऊदी अरब के HUMAIN जैसे देशों के विपरीत, भारत का मॉडल पूरी तरह से निजी पूंजी और कॉम्पिटिटिव फर्म-लेवल डेवलपमेंट पर टिका है। Krutrim जैसे स्टार्टअप्स ने अब केवल मॉडल बनाने के बजाय AI क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, ताकि रिसर्च से आगे बढ़कर प्रॉफिटेबिलिटी पर ध्यान दिया जा सके।

क्या हैं चुनौतियां?

भले ही सेक्टर बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी ज्यादातर डील सीड (Seed) या अर्ली-स्टेज तक ही सीमित हैं। सबसे बड़ा रिस्क विदेशी टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय AI मॉडल्स तक पहुंच बाधित होने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि भारतीय कंपनियां अभी भी कोर स्टेबिलिटी के लिए वैश्विक प्रदाताओं पर निर्भर हैं। निवेशकों की नजरें अब केवल मॉडल बनाने पर नहीं, बल्कि कंपनियों के एंटरप्राइज कॉन्ट्रैक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती पर टिकी हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.