13 जुलाई को Nifty IT इंडेक्स में **4%** तक की तेजी देखी गई। विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर कोरियाई सेमीकंडक्टर शेयरों में बिकवाली के बाद अपना पैसा भारतीय बाजार में लगाना शुरू कर दिया है। यह कदम Samsung Electronics और SK Hynix जैसी ग्लोबल टेक कंपनियों में जोखिम कम करने की रणनीति का हिस्सा है।
कोरियाई चिपमेकर्स में भारी बिकवाली का असर
दक्षिण कोरिया के सेमीकंडक्टर सेक्टर में अचानक आई मंदी ने निवेशकों की भावनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। SK Hynix के शेयर 15% तक गिरे, जबकि Samsung Electronics में करीब 11% की गिरावट आई। इन गिरावटों की वजह से बेंचमार्क Kospi इंडेक्स को कारोबार रोकना पड़ा और यह 9% लुढ़क गया। मार्केट रिपोर्ट्स के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने करीब $1.1 बिलियन के कोरियाई शेयर बेचे हैं। यह बिकवाली कम आय की उम्मीदों और दूसरे अंतरराष्ट्रीय एसेट्स में पैसा लगाने की रणनीति के चलते हुई।
भारत की ओर बढ़ा पैसा
विश्लेषकों का मानना है कि इस ग्लोबल कैपिटल शिफ्ट का फायदा भारतीय बाजार को मिल रहा है। निवेशक चिप-भारी पोर्टफोलियो में अपना जोखिम कम करने के लिए स्थिर बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां विकास के अलग-अलग ड्राइवर हैं। भारत का IT सेक्टर, जो फिजिकल सेमीकंडक्टर बनाने के बजाय सर्विसेज प्रदान करता है, ग्लोबल निवेशकों के लिए टेक्नोलॉजी स्पेस में एक अलग तरह का एक्सपोजर माना जाता है। हालिया ट्रेडिंग सत्रों के आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने पिछले आठ दिनों में से पांच दिनों में भारतीय बाजार में खरीदारी की है, जिससे अस्थिरता के दौर में बाजार को मजबूती मिली है।
सेक्टर के अंतर को समझना
यह बदलाव बताता है कि ग्लोबल इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के विभिन्न सेगमेंट को कैसे अलग करती है। Samsung और SK Hynix जैसे सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरर चिप्स की ग्लोबल कंज्यूमर डिमांड, हार्डवेयर साइकल्स और कच्चे माल की लागत के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। इसके विपरीत, भारतीय IT सर्विसेज कंपनियां मुख्य रूप से ग्लोबल एंटरप्राइजेज के लिए सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन कॉन्ट्रैक्ट्स से रेवेन्यू जेनरेट करती हैं। दोनों सेक्टर टेक-केंद्रित होने के बावजूद, उनके फाइनेंशियल साइकल्स काफी भिन्न हो सकते हैं। निवेशक आमतौर पर भारतीय IT के प्रदर्शन को संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में क्लाइंट खर्च के साथ-साथ करेंसी में उतार-चढ़ाव के आधार पर देखते हैं, न कि ग्लोबल सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग मार्केट की सप्लाई-डिमांड बैलेंस के आधार पर। इन निवेशों की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय IT कंपनियां भविष्य में क्लाइंट की मांग और पश्चिमी बाजारों में संभावित बजट में कटौती को कैसे संभालती हैं।
