भारतीय IT सेक्टर अब मास हायरिंग के बजाय प्रोडक्टिविटी पर फोकस कर रहा है। FY2026 में टॉप-5 कंपनियों ने अपने वर्कफोर्स में **7,000** की कटौती की है। AI के बढ़ते प्रभाव और कम क्लाइंट स्पेंडिंग के चलते फ्रेशर्स की भर्ती भी कम हो गई है।
भारतीय IT सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पुरानी 'वॉल्यूम-बेस्ड' हायरिंग को छोड़कर अब कंपनियां 'प्रोडक्टिविटी' पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इसकी मुख्य वजह AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का बढ़ता इस्तेमाल और ग्लोबल क्लाइंट्स की ओर से खर्चों में की जा रही कटौती है।
वर्कफोर्स डायनेमिक्स में बदलाव
FY2026 के आंकड़ों के मुताबिक, देश की टॉप-5 IT कंपनियों ने अपने वर्कफोर्स में करीब 7,000 की कमी की है। Tata Consultancy Services (TCS) की बात करें, तो कंपनी ने साल भर में 23,460 भूमिकाओं में कटौती की, जो कि उनके इतिहास में सबसे बड़ी गिरावट है। अब कंपनियां उन्हीं लोगों को प्राथमिकता दे रही हैं जो AI, मशीन लर्निंग, क्लाउड और साइबर सिक्योरिटी में एक्सपर्ट हैं।
रूटीन काम पर संकट
बेसिक टेस्टिंग, एप्लीकेशन मेंटेनेंस और एंट्री-लेवल कोडिंग जैसे कामों को अब ऑटोमेशन टूल्स संभाल रहे हैं। इसका असर फ्रेशर हायरिंग पर साफ दिख रहा है। जहां पहले कंपनियां 40,000 से ज्यादा फ्रेशर्स को नौकरी देती थीं, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 25,000 के आसपास रह गया है। इसके अलावा, भारत में Global Capability Centres (GCCs) में भी 5,000 से 30,000 के बीच छंटनी होने का अनुमान है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
यह बदलाव बिजनेस मॉडल को भी बदल रहा है। अब कंपनियां 'आवरली बिलिंग' के बजाय 'आउटकम-बेस्ड' प्राइसिंग की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, IT इंडेक्स में इस साल 27% की भारी गिरावट देखी गई है, जो इस सेक्टर के संघर्ष को दिखाती है।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता 'स्किल गैप' है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि करीब 53% से 60% वर्कफोर्स के पास अभी नई AI-ड्रिवन नौकरियों के लिए जरूरी स्किल्स नहीं हैं। अमेरिका जैसे प्रमुख बाजारों में धीमी मांग और घटते मार्जिन को देखते हुए, आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा कि कंपनियां अपने रेवेन्यू को कैसे स्टेबल रखती हैं।
