भारतीय IT कंपनियां अब बड़े पैमाने पर भर्ती के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे खास क्षेत्रों के लिए 'स्किल्ड' लोगों को नौकरी दे रही हैं। इस बदलाव से एक्सपर्ट्स की सैलरी तो बढ़ रही है, लेकिन कंपनियों के मुनाफे (Profit Margins) पर दबाव और फ्रेशर्स के लिए अवसर कम हो रहे हैं।
IT सेक्टर में बड़ा बदलाव
भारतीय IT सेक्टर में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां कंपनियां बड़ी संख्या में फ्रेश ग्रेजुएट्स को हायर करके उन्हें ट्रेनिंग देती थीं, वहीं अब 'कैंडिडेट' की काबिलियत के आधार पर सेलेक्ट करने का तरीका अपनाया जा रहा है। इसकी मुख्य वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल है, जो रूटीन कामों को ऑटोमेट कर रहा है और वहीं दूसरी तरफ खास स्किल्स वाले प्रोफेशनल्स की डिमांड बढ़ा रहा है।
AI से बढ़ी डिमांड, घटी एंट्री-लेवल जॉब्स
इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि AI काम करने के तरीके को बदल रहा है, लेकिन यह नौकरियों का नेट क्रिएटर भी साबित हो रहा है। 2022 से अगस्त 2026 के बीच AI से जुड़े करीब 83,100 नए हायरिंग हुए, जबकि AI इंटीग्रेशन से लगभग 31,921 नौकरियां कम हुईं या बदलीं। हालांकि, इन नई नौकरियों का नेचर काफी अलग है। कंपनियां अब जनरल सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड आर्किटेक्चर जैसे खास क्षेत्रों में एक्सपर्ट्स की तलाश कर रही हैं।
'K-शेप' सैलरी एनवायरनमेंट
इस बदलाव ने सैलरी में एक 'K-शेप' यानी अलग-अलग तरह का माहौल बना दिया है। एडवांस्ड डिजिटल स्किल्स वाले प्रोफेशनल्स को लगभग 30% ज्यादा सैलरी मिल रही है, जिसमें AI स्किल्स का प्रीमियम और जुड़ जाता है। वहीं, ट्रेडिशनल एंट्री-लेवल की नौकरियों में हायरिंग लगभग ठप हो गई है। 2021-22 में 12%-15% की असामान्य सैलरी बढ़ोतरी के बाद, 2023-24 में जनरल इंडस्ट्री में सैलरी इंक्रीमेंट 8%-9% के टिकाऊ रेंज में आ गया है, क्योंकि कंपनियां कॉस्ट पर कंट्रोल और ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर ध्यान दे रही हैं।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या हैं मायने?
इन्वेस्टर्स के लिए यह बदलाव काफी अहम है। इस ट्रांजिशन के लिए कंपनियों को अपने कर्मचारियों को री-स्कििलिंग (पुनः प्रशिक्षित) करने में बड़ा निवेश करना पड़ रहा है, करीब 32% कंपनियां मौजूदा वर्कफोर्स को ट्रेनिंग देने को प्राथमिकता दे रही हैं। री-स्कििलिंग लंबी अवधि में कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए जरूरी है, लेकिन खास स्किल्स वाले टैलेंट की हाई कॉस्ट और ट्रेनिंग प्रोग्राम का खर्च शॉर्ट से मीडियम टर्म में ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। इसके अलावा, 82% एम्प्लॉयर्स को जरूरी स्किल्स वाले लोग खोजने में मुश्किल हो रही है, जो एक बिजनेस एग्जीक्यूशन रिस्क पैदा करता है अगर कंपनियां तेजी से अपनी कैपेबिलिटी नहीं बढ़ा पातीं।
फ्रेशर्स की हायरिंग पर असर
यह माहौल फ्रेशर्स की हायरिंग पाइपलाइन के लिए भी चुनौती खड़ी कर रहा है, जो IT फर्म्स के लिए हमेशा से एक भरोसेमंद टैलेंट सोर्स रहा है। जैसे-जैसे AI एंट्री-लेवल टास्क संभाल रहा है, 'हायर-एंड-ट्रेन' मॉडल की इकोनॉमिक एफिशिएंसी कम हो रही है। इससे फ्रेशर्स की भर्ती में कमी आई है, जिसे इन्वेस्टर्स अक्सर लॉन्ग-टर्म हेडकाउंट ग्रोथ और रेवेन्यू पोटेंशियल के लीडिंग इंडिकेटर के तौर पर देखते हैं।
आगे क्या देखना होगा?
शेयरहोल्डर्स के लिए सबसे अहम यह देखना होगा कि IT कंपनियां इस ट्रांजिशन को कितनी प्रभावी ढंग से मैनेज करती हैं। मुख्य रूप से इन बातों पर नजर रखनी होगी: ऑपरेटिंग मार्जिन पर तिमाही अपडेट, टैलेंट मिसमैच के बावजूद कंपनियों की यूटिलाइजेशन रेट बनाए रखने की क्षमता, और री-स्कििलिंग व स्पेशलाइज्ड हायरिंग बजट के फाइनेंशियल इम्पैक्ट पर मैनेजमेंट की कमेंट्री। बड़ी IT कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे स्पेशलाइज्ड टेक टैलेंट के लिए हाई प्रीमियम और ओवरऑल प्रॉफिटेबिलिटी को बचाने की जरूरत के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।
