अमेरिका में H-1B वीजा रजिस्ट्रेशन पर **$1,00,000** की भारी-भरकम फीस लगने के बाद भारतीय IT कंपनियों ने अपनी रणनीति बदल दी है। TCS, Infosys और HCL जैसी दिग्गज कंपनियों ने वीजा फाइलिंग में **92%** की बड़ी गिरावट दर्ज की है, जो अब सीधे तौर पर उनके मार्जिन (Profit Margins) पर असर डाल सकती है।
बदल गया पुराना बिजनेस मॉडल
अब तक भारतीय IT कंपनियां भारत से बड़ी संख्या में इंजीनियर्स को अमेरिका भेजकर अपना काम चलाती थीं, जो काफी किफायती होता था। लेकिन अब $1,00,000 की नई वीजा फीस के चलते यह मॉडल पूरी तरह से आर्थिक रूप से कमजोर (unsustainable) हो गया है। कंपनियों के पास अब दो ही रास्ते बचे हैं: या तो अमेरिका में ही महंगे लोकल टैलेंट को हायर करें या फिर काम को भारत से ऑफशोर (offshore) तरीके से मैनेज करें।
मार्जिन पर बढ़ेगा दबाव
अमेरिका में लोकल हायरिंग का मतलब है कंपनियों के लिए वेतन का खर्च (wage bill) कई गुना बढ़ जाना। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या ये कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च का बोझ अपने क्लाइंट्स पर डाल पाएंगी, या फिर आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन (Operating Profit Margins) में बड़ी गिरावट आएगी।
ऑफशोर और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स पर फोकस
लागत को कम करने के लिए अब IT दिग्गज अपनी ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) को भारत में और मजबूत कर रहे हैं। साथ ही, कनाडा और लैटिन अमेरिका जैसे देशों में 'नियरशोर' (nearshore) ऑपरेशंस बढ़ाकर काम को सुचारू रखने की कोशिश की जा रही है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
Microsoft और Apple जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों के लिए यह फीस इतनी बड़ी समस्या नहीं है क्योंकि उनका मार्जिन बहुत अधिक होता है। हालांकि, भारतीय IT सेक्टर के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि उनका वॉल्यूम-आधारित मॉडल बहुत ही पतले मार्जिन पर चलता है। निवेशकों को अगली तिमाही के नतीजों में 'एम्प्लॉई बेनिफिट एक्सपेंस' (employee benefit expenses) के आंकड़ों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
