भारत की बड़ी IT कंपनियों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल में एक नई चुनौती का सामना करना शुरू कर दिया है। AI पर होने वाला खर्च, खासकर 'टोकन कॉस्ट' के बढ़ने से कंपनियों के टेक बिल बढ़ रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए TCS, HCLTech और Wipro जैसी कंपनियां अब अपने ग्राहकों के लिए हाइब्रिड मॉडल स्ट्रेटेजी अपना रही हैं।
AI के खर्च पर लगाम लगाने की कवायद
जैसे-जैसे कंपनियां AI का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं, 'टोकन' की खपत भी तेजी से बढ़ी है। ये टोकन AI द्वारा प्रोसेस किए गए डेटा की मात्रा को मापते हैं, और इनकी बढ़ती संख्या के कारण कंपनियों के ऑपरेशनल बिल काफी बढ़ गए हैं। इस स्थिति को देखते हुए, Tata Consultancy Services (TCS), HCL Technologies और Wipro जैसी दिग्गज IT फर्म्स अपने क्लाइंट्स को सिंगल-मॉडल अप्रोच से हटकर हाइब्रिड या टियर्ड (tiered) स्ट्रेटेजी की ओर जाने में मदद कर रही हैं। इसका मुख्य उद्देश्य इन बढ़ते खर्चों को बेहतर तरीके से मैनेज करना है।
हाइब्रिड AI मॉडल की ओर बढ़ता कदम
इंडस्ट्री में यह नया ट्रेंड है कि रोजमर्रा के और कम जटिल कामों के लिए सस्ते और छोटे AI मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, हाई-एंड और भारी कंप्यूटिंग पावर वाले बड़े लैंग्वेज मॉडल (LLMs) को सिर्फ खास और मुश्किल कामों के लिए ही आरक्षित रखा जा रहा है। इस तरीके से टेक्नोलॉजी बजट को कंट्रोल में रखने के साथ-साथ प्रोजेक्ट की परफॉरमेंस को भी बनाए रखा जा रहा है। IT कंपनियों के एग्जीक्यूटिव्स का कहना है कि कॉस्ट ऑप्टिमाइजेशन अब चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर्स (CFOs) की पहली प्राथमिकता बन गई है, जो AI में किए गए खर्च पर सीधा रिटर्न (ROI) देखना चाहते हैं।
HCLTech ने क्लाइंट्स की जरूरतों के हिसाब से सही AI मॉडल चुनने के लिए एक टियर्ड सर्विस स्ट्रक्चर पेश किया है। इसी तरह, Wipro और Cognizant जैसी कंपनियां भी अपनी सर्विस डिलीवरी को एडजस्ट कर रही हैं, ताकि वे महंगे और 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' इंप्लीमेंटेशन से हटकर मापे जा सकने वाले बिजनेस आउटकम्स पर फोकस कर सकें। यह एक बड़े ट्रेंड को दर्शाता है, जहां कंपनियां अब AI के बिलों की जांच उसी तरह कर रही हैं जैसे वे अपने पारंपरिक IT इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्च की करती हैं।
IT सर्विसेज और बिजनेस आउटकम्स पर असर
भारतीय IT कंपनियों के लिए यह बदलाव एक चुनौती और अवसर दोनों है। AI की खपत में उछाल शुरू में रेवेन्यू के लिए फायदेमंद लग रहा था, लेकिन अब टोकन कॉस्ट को कंट्रोल करने के दबाव का मतलब है कि इन फर्म्स को बेहतर कॉस्ट-एफिशिएंसी और टेक्निकल एजिलिटी दिखानी होगी। ब्रोकरेज फर्म्स के एनालिस्ट्स का कहना है कि छोटे और बड़े AI मॉडल्स को मिलाकर बने इस टियर्ड AI स्टैक पर फोकस करने से स्पेशलाइज्ड सर्विसेज की नई मांग पैदा हो रही है। खासकर डेटा तैयार करने और इन छोटे, कस्टम-बिल्ट मॉडल्स को ट्रेन करने जैसे क्षेत्रों में।
यह स्ट्रेटेजिक बदलाव ऐसे समय में आया है जब प्रमुख IT एक्सपोर्टर्स एक चुनौतीपूर्ण फाइनेंशियल शुरुआत का सामना कर रहे हैं। स्टॉक मार्केट की परफॉरमेंस अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि AI कितनी जल्दी मार्जिन्स को बढ़ा सकता है। इन्वेस्टर्स इस बात पर नजर रख रहे हैं कि ये कंपनियां हाई-एंड AI क्षमताओं में निवेश करने और प्रॉफिट मार्जिन्स को बनाए रखने के बीच कैसे संतुलन बना पाती हैं, खासकर जब क्लाइंट्स ज्यादा लागत-प्रभावी समाधानों की मांग कर रहे हैं। लाभप्रदता पर दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि ये IT फर्म्स कितने कुशल और स्केलेबल AI इंटीग्रेशन दे पाती हैं, जिनसे उनके ग्राहकों को स्पष्ट लागत बचत या बेहतर उत्पादकता मिले। अगले तिमाही नतीजों में मैनेजमेंट की कमेंट्री से यह साफ होगा कि AI मॉडल ऑप्टिमाइजेशन डील मार्जिन्स और रेवेन्यू ग्रोथ को कैसे प्रभावित करते हैं।
