भारतीय IT सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। फाइनेंशियल ईयर **2026** में देश की **5** सबसे बड़ी IT कंपनियों ने अपने वर्कफोर्स में **6,981** की कटौती की है। इसका मुख्य कारण AI की बढ़ती ताकत और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का बढ़ता दबदबा है।
वर्कफोर्स मॉडल में बड़ा बदलाव
IT सेक्टर का पुराना 'पिरामिड स्टाफिंग मॉडल' अब दबाव में है। पहले कंपनियां बड़ी संख्या में एंट्री-लेवल इंजीनियर्स को काम पर रखती थीं, लेकिन AI के आने से यह पैटर्न बदल गया है। अब कोडिंग और टेक्निकल टास्क के लिए इंसानी हाथों की जगह ऑटोमेशन ने ले ली है।
AI और GCCs की चुनौती
इंडस्ट्री पर दोतरफा मार पड़ रही है। पहला, AI-ड्रिवन ऑटोमेशन उन कामों को आसानी से निपटा रहा है जो पहले जूनियर स्टाफ करते थे। दूसरा, ग्लोबल क्लाइंट्स अब अपने काम को आउटसोर्स करने के बजाय अपने खुद के 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' (GCCs) में इन-हाउस मैनेज कर रहे हैं। इससे IT सर्विस कंपनियों की निर्भरता वाले बड़े वर्कफोर्स की जरूरत कम हो गई है।
कमाई का पुराना तरीका अब पुराना हो गया
अब तक भारतीय IT कंपनियां 'आवरली बिलिंग' (Hourly Billing) मॉडल पर चलती थीं, यानी जितने घंटे काम, उतनी कमाई। लेकिन अब क्लाइंट्स 'आउटकम-बेस्ड' कॉन्ट्रैक्ट्स मांग रहे हैं, जहाँ सिर्फ काम के परिणाम (Result) के लिए पैसा दिया जाता है।
निवेशकों के लिए चुनौती यह है कि पुरानी कमाई के स्रोत धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, जबकि नए हाई-वैल्यू कॉन्ट्रैक्ट्स को पकड़ने में कंपनियों को अभी समय लगेगा। आने वाले समय में कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन इस बात पर टिका होगा कि वे कितनी जल्दी अपनी 'इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी' को बढ़ा पाती हैं और सर्विस-बेस्ड से वैल्यू-बेस्ड मॉडल पर शिफ्ट होती हैं।
