भारत की बड़ी IT कंपनियों ने फाइनेंशियल ईयर 2026 में कुल **7,389** कर्मचारियों को कम किया है। यह AI और ऑटोमेशन के चलते काम करने के तरीकों में बड़े बदलाव का संकेत है। पिछली बार की तरह सिर्फ मांग में कमी नहीं, बल्कि ऑपरेशन को सुव्यवस्थित करने पर जोर है। निवेशकों को इस बदलाव पर नजर रखनी होगी कि ऑटोमेशन और खास स्किल्स का प्रॉफिट मार्जिन पर क्या असर पड़ेगा।
IT सेक्टर में बड़ा बदलाव: AI से छंटनी, बढ़ी एफिशिएंसी
भारतीय टेक्नोलॉजी सर्विसेज सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कंपनियां अब कर्मचारियों की संख्या कम कर रही हैं और ज्यादा वैल्यू वाले डिजिटल सर्विसेज पर फोकस कर रही हैं। Tata Consultancy Services, Infosys, HCLTech, Wipro और Tech Mahindra जैसी बड़ी IT कंपनियों के आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2026 (जो मार्च 2026 में खत्म हुआ) में कुल 7,389 कर्मचारियों की संख्या कम हुई है। यह पिछले सालों के मुकाबले एक बड़ा उलटफेर है, जहां कंपनियां लगातार हायरिंग कर रही थीं।
ऑटोमेशन की ओर बढ़ता कदम
अब IT कंपनियां सिर्फ कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर बिजनेस बढ़ाने के बजाय प्रोडक्टिविटी और खास स्किल्स पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। TeamLease जैसी फर्मों का अनुमान है कि इस साल पूरे सेक्टर में 25,000 से 35,000 नौकरियां कम हो सकती हैं। ये छंटनियां सीधे तौर पर पब्लिक अनाउंसमेंट के बजाय इंटरनल परफॉरमेंस रिव्यू और गैर-जरूरी (redundant) रोल्स को खत्म करने के जरिए हो रही हैं।
यह ट्रेंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और एडवांस्ड ऑटोमेशन टूल्स के इस्तेमाल से जुड़ा है। रूटीन सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और सपोर्ट जैसे कामों को ऑटोमेट करके, कंपनियां अपने ऑपरेटिंग मार्जिन को बेहतर बनाने का लक्ष्य रख रही हैं। उदाहरण के लिए, TCS ने FY26 के दौरान 23,460 कर्मचारियों की संख्या कम की है। कंपनी अपनी ऑर्गनाइजेशनल स्ट्रक्चर को सरल बना रही है और पेंडेमिक के दौरान की गई तेज हायरिंग से बने हायरार्किकल लेयर्स को कम कर रही है।
प्रॉफिटेबिलिटी और मार्जिन पर असर
निवेशकों के लिए यह समझना अहम है कि इन स्ट्रक्चरल बदलावों का प्रॉफिटेबिलिटी पर क्या असर पड़ेगा। पहले, भारतीय IT कंपनियां रेवेन्यू बढ़ाने के लिए सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स की संख्या बढ़ाती थीं। अब फोकस 'कॉग्निटिव लीवरेज' पर है, जहां कंपनियां AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स को प्राथमिकता दे रही हैं। भले ही इस ट्रांजिशन में कुछ खर्च (जैसे सेवरेंस और री-ट्रेनिंग) आए, लेकिन लंबे समय में इसका लक्ष्य रेवेन्यू ग्रोथ को सिर्फ हेडकाउंट एडिशन से अलग करके प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाना है।
हालांकि, इस बदलाव में जोखिम भी हैं। IT इंडस्ट्री को स्किल्स के बढ़ते अंतर (skill gap) को पाटना होगा। जैसे-जैसे ऑटोमेशन से रूटीन जॉब्स पर दबाव बढ़ रहा है, कंपनियों को अपने मौजूदा कर्मचारियों को हाई-एंड डिजिटल सर्विसेज की मांग को पूरा करने के लिए री-डिप्लॉय या अपस्किल करना होगा। अगर वे इन स्पेशलाइज्ड रिक्वायरमेंट्स के मुताबिक ढलने में नाकाम रहते हैं, तो प्रोजेक्ट्स की डिलीवरी में देरी हो सकती है या वे ग्लोबल प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ सकते हैं, जो AI-ड्रिवन डिलीवरी मॉडल तेजी से अपना रहे हैं।
निवेशकों को आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए कि क्या ये एफिशिएंसी मेजर्स लगातार मार्जिन सुधार दिखा रहे हैं। अगले 12 से 18 महीनों में, कंपनियों की हाई-ग्रोथ एरियाज में टैलेंट पूल बनाए रखने और वर्कफोर्स रीस्ट्रक्चरिंग से जुड़े खर्चों को मैनेज करने की क्षमता एक महत्वपूर्ण फैक्टर होगी।
