भारतीय कंपनियां अब AI के छोटे प्रयोगों से आगे बढ़कर ठोस बिजनेस नतीजों और बड़े पैमाने पर काम करने की ओर बढ़ रही हैं। साल 2025 में भारत में प्राइवेट AI इन्वेस्टमेंट **$4.1 बिलियन** तक पहुंच गया है, जिससे निवेशकों की नजरें अब सिर्फ एडॉप्शन पर नहीं, बल्कि कंपनी की प्रॉफिटेबिलिटी पर हैं।
भारतीय कॉर्पोरेट जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रयोगों और टेस्टिंग के दौर से गुजरने के बाद, अब बोर्डरूम में चर्चा 'कितने प्रोजेक्ट्स शुरू किए' से बदलकर 'कितना रिटर्न (ROI) मिला' पर आ गई है। यह तकनीक पर खर्च के मामले में सख्त फाइनेंशियल अनुशासन की शुरुआत है।
बढ़ता निवेश और बढ़ते खर्च
साल 2025 में भारत में प्राइवेट AI इन्वेस्टमेंट तीन गुना बढ़कर $4.1 बिलियन के स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, फाइनेंस लीडर्स के लिए चिंता का विषय 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' है, क्योंकि कई बार AI प्रोजेक्ट्स का खर्च बजट से कहीं ज्यादा निकल रहा है। निवेशकों के लिए अब महत्वपूर्ण यह है कि कौन सी कंपनियां AI के जरिए ऑपरेटिंग मार्जिन में सुधार कर रही हैं।
डेटा की चुनौती (Data Readiness Gap)
AI को बड़े पैमाने पर लागू करने में सबसे बड़ी बाधा 'डेटा की कमी' है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, केवल 4% भारतीय संगठन यह मानते हैं कि उनका डेटा AI मॉडल को सपोर्ट करने के लिए पूरी तरह तैयार है। बिना सही डेटा के AI टूल्स से सटीक नतीजे मिलना मुश्किल है, जो कंपनी के लिए देरी और अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकता है।
गवर्नेंस और निवेशकों के लिए सीख
जैसे-जैसे AI कोर बिजनेस प्रोसेस का हिस्सा बन रहा है, गवर्नेंस और ऑपरेशनल ट्रस्ट पर भी फोकस बढ़ा है। बिना स्पष्ट गवर्नेंस फ्रेमवर्क के कंपनियां अपनी पूंजी बर्बाद कर सकती हैं। अब निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो AI के जरिए ऑपरेशनल एफिशिएंसी और लागत में कटौती का ठोस प्रमाण दे रही हैं, न कि सिर्फ AI अपनाने के दावे कर रही हैं।
