भारतीय कंपनियां साइबर सुरक्षा को लेकर अभी भी सतर्क नहीं हैं। ज्यादातर बिजनेस डेटा चोरी या हमले के बाद ही खर्च करना पसंद करते हैं, जो आने वाले समय में DPDP Act के तहत **₹250 करोड़** तक के जुर्माने का सबब बन सकता है।
सुरक्षा के मामले में भारतीय कंपनियों का ढुलमुल रवैया
इंडस्ट्री के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, 64% कंपनियां किसी साइबर हमले (Data Breach) के बाद ही सुरक्षा पर नया बजट खर्च करती हैं, जबकि सिर्फ 29% कंपनियां रेगुलेटरी नियमों को ध्यान में रखकर पहले से तैयारी करती हैं। यह रिएक्टिव एप्रोच कंपनियों के बैलेंस शीट पर भारी पड़ रही है। आपातकालीन स्थिति में सुरक्षा उपाय अपनाने से न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि ऑपरेशन्स भी लंबे समय तक ठप रह सकते हैं।
DPDP Act का कड़ा शिकंजा
निवेशकों के लिए अब साइबर रिस्क को मॉनिटर करना जरूरी हो गया है। 13 मई, 2027 से पूरी तरह लागू होने वाले डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के तहत, नियमों का उल्लंघन करने पर कंपनियों को प्रति केस ₹250 करोड़ तक का भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। यह रकम मिड-कैप कंपनियों के मुनाफे और कैपिटल बफर को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।
वित्तीय संस्थानों पर सबसे ज्यादा दबाव
विशेष रूप से फाइनेंशियल सेक्टर पर RBI और SEBI की नजरें टेढ़ी हैं। रेगुलेटर्स अब साइबर रेजिलिएंस, API सिक्योरिटी और AI से जुड़े खतरों पर सख्त हो गए हैं। जो फाइनेंशियल संस्थान मजबूत सिक्योरिटी सिस्टम नहीं बना पा रहे हैं, उन्हें रेगुलेटरी एक्शन और ऑपरेशनल पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की खामियां
रिपोर्ट बताती है कि 57% फर्में अभी भी पुराने तरीके से बैकअप ले रही हैं। इसमें 'वल्नेरेबिलिटी विंडोज' (Vulnerability Windows) का खतरा बना रहता है, जहां डेटा चोरी होने पर उसे रिकवर करना लगभग नामुमकिन होता है। आधुनिक साइबर हमले सीधे बैकअप सर्वर को निशाना बना रहे हैं, जिसे देखते हुए पुराने सुरक्षा तरीके अब नाकाफी साबित हो रहे हैं।
निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनी के मैनेजमेंट की कमेंट्री, साइबर गवर्नेंस के प्रति गंभीरता और ऑटोमेटेड सिक्योरिटी प्लेटफॉर्म्स के अडॉप्शन पर कड़ी नजर रखें। यह देखना जरूरी है कि कंपनी अपने डिजिटल विस्तार और सुरक्षा के बीच कैसा संतुलन बना रही है।
