भारतीय कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को बड़े स्तर पर शामिल कर रही हैं। निवेशकों की नजर इस बात पर है कि टेक्नोलॉजी पर किया जा रहा भारी खर्च क्या भविष्य में मुनाफे (Profit Margin) को बढ़ा पाएगा या यह एक चुनौती बनकर उभरेगा।
भारतीय कंपनियां अब महज ऑटोमेशन से आगे बढ़कर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपनी सप्लाई चेन की मुख्य धुरी बना रही हैं। इस बदलाव का मकसद मशीन लर्निंग के जरिए प्रोक्योरमेंट, इन्वेंट्री मैनेजमेंट और ट्रांसपोर्ट प्लानिंग को आपस में जोड़ना है। प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स की मदद से कंपनियां अब मांग का अनुमान ज्यादा सटीक तरीके से लगा रही हैं, जिसे पहले क्विक-कॉमर्स में देखा गया था और अब बड़ी और पुरानी कंपनियां भी इसे अपना रही हैं।
ऑपरेशंस में AI का असर
निवेशकों के लिए इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा आकर्षण 'ऑपरेशनल एफिशिएंसी' है। AI की मदद से गोदामों के लेआउट और डिलीवरी रूट्स को ऑप्टिमाइज किया जा रहा है, जिससे नई सुविधाएं बनाए बिना ही काम का दायरा बढ़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, PepsiCo India जैसे दिग्गज खिलाड़ी डिजिटल कंट्रोल टावर का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे कच्चे माल की खरीद से लेकर फाइनल डिलीवरी तक पूरी प्रक्रिया की रियल-टाइम जानकारी मिल रही है। इससे इन्वेंट्री टर्नओवर सुधरता है और बर्बादी कम होती है, जिससे कंपनी की नकदी (Cash) बचती है।
इनोवेशन की भारी कीमत
हालांकि, यह बदलाव सस्ता नहीं है। कंपनियों को हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर लाइसेंसिंग और ट्रेनिंग पर भारी निवेश करना पड़ रहा है, जो शॉर्ट-टर्म प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। बड़ा सवाल यह है कि इस निवेश का रिटर्न कब तक मिलेगा, क्योंकि शुरुआती खर्च का सीधा फायदा तुरंत दिखना मुश्किल है।
एक बड़ी चुनौती पुरानी टेक्नोलॉजी (Legacy Systems) की भी है। अगर पुरानी प्रणालियां नए AI सॉफ्टवेयर के साथ सही से तालमेल नहीं बिठा पातीं, तो डेटा गलत हो सकता है। ऐसे में टेक्नोलॉजी तो मौजूद होती है, लेकिन उसका व्यावहारिक फायदा नहीं मिल पाता।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो बेहतर वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट और सुरक्षित प्रॉफिट मार्जिन का सबूत दे सकें। आने वाली तिमाहियों के रिजल्ट और मैनेजमेंट की कमेंट्री यह बताने के लिए काफी होगी कि AI के इस्तेमाल से कंपनी की परफॉर्मेंस में वास्तविक सुधार हो रहा है या नहीं।
