क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत में **10-15%** की बढ़ोतरी को देखते हुए भारतीय कंपनियां अब 'FinOps' फ्रेमवर्क का रुख कर रही हैं। यह कदम प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रखने और डिजिटल खर्चों में फिजूलखर्ची कम करने के लिए उठाया गया है।
भारतीय व्यापार जगत अब क्लाउड पर होने वाले अनियंत्रित खर्चों के दौर से बाहर निकल रहा है। कंपनियां अब इंफ्रास्ट्रक्चर बिलों को मैनेज करने के लिए 'फाइनेंशियल ऑपरेशन्स' यानी FinOps को एक स्टैंडर्ड रणनीति के तौर पर अपना रही हैं। चूंकि क्लाउड की लागत हर साल 10-15% बढ़ रही है, इसलिए कंपनियां अब टेक्नोलॉजी खर्च को बैक-ऑफिस का मामला मानने के बजाय उसे सीधे अपने इंजीनियरिंग वर्कफ्लो से जोड़ रही हैं।
मार्जिन बचाने की जद्दोजहद
इस बदलाव की मुख्य वजह बढ़ती ओवरहेड लागतों के बीच प्रॉफिट मार्जिन को बचाना है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, ग्लोबल क्लाउड खर्च का करीब 29% हिस्सा बर्बाद हो जाता है, जिसमें बेकार पड़ा सर्वर कैपेसिटी या जरूरत से ज्यादा स्टोरेज शामिल है। गवर्नेंस फ्रेमवर्क अपनाने से कंपनियां इन खामियों को पहचानकर उन्हें दूर कर रही हैं। कई एड-टेक और फाइनेंशियल संस्थानों ने अपने क्लाउड बिल को 30% से 35% तक कम करने में कामयाबी हासिल की है। यह अनुशासन सीधे तौर पर ऑपरेटिंग प्रॉफिट को सपोर्ट करता है।
AI का बढ़ता चैलेंज
कंपनियां अब तेजी से AI की ओर बढ़ रही हैं, जो पारंपरिक क्लाउड कंप्यूटिंग से काफी महंगा है और जिसके खर्चों का अनुमान लगाना कठिन है। फिलहाल 98% FinOps टीमें AI से जुड़े खर्चों को मैनेज कर रही हैं, लेकिन यह जोखिम बना हुआ है कि ये खर्चे मौजूदा कंट्रोल फ्रेमवर्क से भी तेज गति से न बढ़ जाएं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
वर्तमान में 67% भारतीय कंपनियां FinOps का उपयोग कर रही हैं। निवेशकों के लिए यह निगरानी करना जरूरी है कि कंपनियां कैसे अपनी ग्रोथ और कॉस्ट एफिशिएंसी के बीच संतुलन बना रही हैं। आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स में मैनेजमेंट की कमेंट्री इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि वे AI इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्च को कैसे कंट्रोल कर रहे हैं और यह ऑपरेटिंग मार्जिन को सुरक्षित रखने में कितनी मददगार साबित हो रही है।
