भारत की सेमीकंडक्टर डिजाइन इंडस्ट्री एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। सरकार की डिजाइन लिंक्ड इंसेटिव (DLI) स्कीम के तहत सपोर्टेड स्टार्टअप्स ने मिलकर **$100 मिलियन** (लगभग **₹830 करोड़**) से ज्यादा की फंडिंग जुटाई है। साथ ही, इन कंपनियों ने **35** चिप डिजाइन टेप-आउट्स (chip tape-outs) का बड़ा मील का पत्थर भी हासिल कर लिया है।
भारत की चिप डिजाइन क्षमता में बड़ा उछाल
DLI स्कीम से मदद पा रही ये कंपनियां अब प्रोटोटाइप डिजाइन से आगे बढ़कर फंक्शनल सिलिकॉन बनाने में सक्षम हो रही हैं। टेप-आउट एक अहम पड़ाव होता है, जहां चिप के फाइनल डिजाइन को फैब्रिकेशन (निर्माण) के लिए भेजा जाता है ताकि यह जांचा जा सके कि चिप उम्मीद के मुताबिक काम कर रही है या नहीं।
Aheesa Digital Innovations का बड़ा कदम
इस तरक्की में चेन्नई की Aheesa Digital Innovations सबसे आगे है। इस फैबलेस (fabless) स्टार्टअप ने हाल ही में अपने 'VIHAAN' नेटवर्किंग सिस्टम-ऑन-चिप (System-on-Chip) के लिए फर्स्ट-पास सिलिकॉन सक्सेस हासिल की है। यह चिप फाइबर ब्रॉडबैंड एप्लीकेशन्स के लिए बनाई गई है। स्वतंत्रता दिवस पर कन्फर्म हुई यह सफलता मास प्रोडक्शन की ओर एक बड़ा कदम है। अपनी डिजाइन सफलता के अलावा, Aheesa चेन्नई में ₹250 करोड़ के सेमीकंडक्टर डिजाइन और R&D सेंटर के लिए राज्य सरकार के साथ एक समझौते पर भी हस्ताक्षर कर चुका है। इससे पहले, कंपनी ने अपने विकास के लिए निवेशकों से लगभग ₹40 करोड़ जुटाए थे।
डिजाइन क्षमताओं का विस्तार
DLI से समर्थित अन्य कंपनियां भी विभिन्न टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में प्रगति कर रही हैं। Vervesemi Microelectronics ने मोटर-कंट्रोलर चिप का टेस्ट किया है, जबकि Netrasemi ने वीडियो एनालिटिक्स के लिए 12nm Vision SoC को मान्य किया है। OptoML को AI प्रोसेसिंग के लिए 12nm कंप्यूट-इन-मेमोरी SoC मिला है, और IndieSemiC ने अपने ब्लूटूथ मॉड्यूल के लिए ग्लोबल सर्टिफिकेशन हासिल किया है। ये सभी डेवलपमेंट सरकार की 'सेमिकॉन 2.0' (Semicon 2.0) पहल का हिस्सा हैं, जिसके तहत चिप डिजाइन से लेकर फैब्रिकेशन और रिसर्च तक एक मजबूत इकोसिस्टम बनाने के लिए ₹1.27 लाख करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है।
आगे की चुनौतियां
हालांकि, टेप-आउट एक महत्वपूर्ण टेक्निकल उपलब्धि है, लेकिन निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि डिजाइन सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन का सिर्फ पहला चरण है। कमर्शियल सफलता का रास्ता अभी भी काफी मुश्किल है। इन स्टार्टअप्स को मार्केट एक्सेस (market access) हासिल करने और ग्राहकों से वैलिडेशन (customer validation) पाने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। चूंकि ये कंपनियां फैबलेस हैं, यानी वे चिप डिजाइन तो करती हैं लेकिन उनके पास मैन्युफैक्चरिंग प्लांट नहीं हैं, वे बाहरी फाउंड्री (foundries) पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। अगर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता कम होती है या लागत में उतार-चढ़ाव होता है, तो यह निर्भरता सप्लाई चेन के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसके अलावा, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री बहुत प्रतिस्पर्धी है, और इन फर्मों को स्थायी, हाई-वॉल्यूम बिक्री हासिल करने के लिए अपनी डिजाइन को परफॉरमेंस और कीमत दोनों में स्थापित ग्लोबल प्लेयर्स के मुकाबले बेहतर साबित करना होगा।
निवेशक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि क्या ये स्टार्टअप अपनी सफल डिजाइनों को हाई-वॉल्यूम मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट्स (high-volume manufacturing contracts) में बदल पाते हैं। लगातार ग्राहक ऑर्डर हासिल करने और लंबे व कैपिटल-इंटेंसिव प्रोडक्ट डेवलपमेंट साइकिल (capital-intensive product development cycle) को पार करने की इन फर्मों की क्षमता ही उनकी दीर्घकालिक वित्तीय व्यवहार्यता (long-term financial viability) का मुख्य संकेतक होगी।
