भारत में AI और सेमीकंडक्टर इंजीनियरों के लिए ग्लोबल टेक कंपनियों की तरफ से दी जा रही भारी-भरकम सैलरी के चलते स्टार्टअप्स को टैलेंट हायर करने में बड़ी मुश्किल हो रही है। इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने **₹1.275 लाख करोड़** के Semicon 2.0 मिशन का ऐलान किया है, जिस पर अब निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
'गोल्डन हैंडकफ' का असर
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और चिप डिजाइन की दौड़ में इंजीनियरिंग टैलेंट के लिए भारत में जबरदस्त मुकाबला देखने को मिल रहा है। ग्लोबल टेक दिग्गज इतनी मोटी सैलरी दे रहे हैं कि शुरुआती दौर के स्टार्टअप्स उनका मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स इसे 'गोल्डन हैंडकफ' (Golden Handcuff) कह रहे हैं, जहां टैलेंटेड इंजीनियर्स स्टार्टअप्स के रिस्क के बजाय बड़ी कंपनियों की सुरक्षित नौकरियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
डीप-टेक सपनों के सामने चुनौती
टैलेंट की यह कमी भारत की डीप-टेक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ी बाधा बन रही है। सही एक्सपर्ट्स न मिलने से इनोवेशन की गति धीमी हो रही है। इसके अलावा, ग्लोबल हब्स के मुकाबले भारत में अभी भी सप्लाई चेन और स्थानीय इकोसिस्टम का विकास जारी है, जिससे स्टार्टअप्स की लागत बढ़ रही है और काम पूरा होने में अधिक समय लग रहा है।
निवेशकों की बदली हुई रणनीति
निवेशक अब सतर्क हो गए हैं। केवल चिप डिजाइन में पैसा लगाने के बजाय, वे अब मोबिलिटी, एनर्जी ट्रांजिशन और पावर मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे वे टेक्नोलॉजी सेक्टर को सपोर्ट तो कर रहे हैं, लेकिन सेमीकंडक्टर इंजीनियरों की भीषण प्रतियोगिता से बच रहे हैं।
सरकार का सहारा: Semicon 2.0
इस संकट को कम करने के लिए सरकार ने ₹1.275 लाख करोड़ के बजट के साथ Semicon 2.0 मिशन शुरू किया है। इस मिशन का उद्देश्य चिप डिजाइन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) डेवलपमेंट और एडवांस पैकेजिंग के लिए सपोर्ट देना है। सरकार इक्विटी पार्टिसिपेशन और फाइनेंशियल इंसेंटिव्स के जरिए स्टार्टअप्स पर बोझ कम करना चाहती है ताकि वे टैलेंट की महंगी लागत के बावजूद टिके रह सकें।
आने वाले समय में यह देखना होगा कि कितनी जल्दी सरकारी सब्सिडी स्टार्टअप्स तक पहुंचती है और क्या ये कंपनियां ग्लोबल दिग्गजों के सामने अपने इंजीनियर्स को बचाए रखने में सफल हो पाती हैं या नहीं।
