Tata Electronics, CG Power और Kaynes Technology जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियां अब ग्लोबल पार्टनरशिप के जरिए अपने फैक्ट्री ऑपरेशंस को रफ्तार दे रही हैं। घरेलू सप्लाई चेन में जगह बनाने की मुश्किलों के चलते अब एक्सपोर्ट मार्केट पर फोकस बढ़ा दिया गया है ताकि उत्पादन क्षमता का सही इस्तेमाल हो सके।
भारत के सेमीकंडक्टर मिशन को सरकार की तरफ से ₹2.04 लाख करोड़ की भारी-भरकम सब्सिडी का सपोर्ट मिल रहा है। इस मिशन का मुख्य मकसद देश में बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना है। हालांकि, इन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी प्लांट की प्रोडक्शन क्षमता का पूरी तरह से उपयोग करना है, जो मुनाफा कमाने के लिए बेहद जरूरी है।
घरेलू बाजार की चुनौतियां
फिलहाल, नई भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू मार्केट में पैठ बनाना आसान नहीं है। ऑटोमोबाइल और पावर जैसी बड़ी इंडस्ट्रीज पहले से ही अंतरराष्ट्रीय वेंडर्स के साथ लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स में बंधी हैं। इन सप्लाई चेन्स में सेंध लगाना मुश्किल है, क्योंकि इसके लिए एक लंबा ट्रैक रिकॉर्ड और बड़े स्केल पर ऑपरेशंस की जरूरत होती है। यही वजह है कि कंपनियां फिलहाल अपनी फुल कैपेसिटी का इस्तेमाल नहीं कर पा रही हैं।
ग्लोबल पार्टनरशिप की रणनीति
इस डिमांड गैप को पाटने के लिए प्रमुख कंपनियों ने वैश्विक स्तर पर हाथ मिलाना शुरू कर दिया है:
- Tata Electronics: कंपनी ने Nexperia के साथ पार्टनरशिप की है, जो असम में असेंबली और टेस्टिंग ऑपरेशंस में मदद करेगी।
- CG Power: इसकी सब्सिडियरी CG Semi अब जापान की Renesas Electronics को चिप्स सप्लाई कर रही है।
- Kaynes Technology: कंपनी ने अपनी सेल्स पहुंच बढ़ाने के लिए Mitsui & Co. के साथ समझौता किया है।
ये साझेदारियां सिर्फ ग्राहक ढूंढने के लिए नहीं हैं, बल्कि भारत को ग्लोबल सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन का एक अहम हिस्सा बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं।
निवेशकों के लिए अहम संकेत
निवेशकों को अब इन कंपनियों की एक्जीक्यूशन क्षमता पर नजर रखनी चाहिए। सरकारी इंसेंटिव्स एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म प्रॉफिटेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि ये कंपनियां ग्लोबल मार्केट में क्वालिटी और वॉल्यूम के साथ कैसे तालमेल बिठाती हैं। प्लांट के कमिशनिंग डेट्स और नए इंटरनेशनल ऑर्डर्स के अपडेट्स निवेशकों के लिए अगले कुछ समय तक प्रमुख वॉचलिस्ट रहेंगे।
