एक नई इंडस्ट्री रिपोर्ट के अनुसार, 86% भारतीय बैंक 2026 तक जेनरेटिव AI को अपनाएंगे, जिसका मकसद प्रोडक्टिविटी बढ़ाना और लोन की लागत कम करना है। यह एक बड़ा डिजिटल परिवर्तन है, लेकिन निवेशकों को इससे जुड़े एग्जीक्यूशन रिस्क, भारी कैपिटल खर्च और गवर्नेंस की चुनौतियों पर नज़र रखनी चाहिए।
भारतीय बैंकिंग में आया बड़ा तकनीकी मोड़
मुंबई में FIBAC 2026 कॉन्फ्रेंस में पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 तक 86% भारतीय बैंक जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (GenAI) के इस्तेमाल को लागू करने की तैयारी में हैं। यह 2024 में 10% और 2025 में 44% की तुलना में एक बड़ी छलांग है, जो दर्शाता है कि AI अब सिर्फ एक एक्सपेरिमेंटल प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक कोर बिजनेस स्ट्रेटेजी बनता जा रहा है।
लागत घटाने का बड़ा दांव
निवेशकों के लिए, इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फायदा लागत में कमी है। बैंकों के लिए ऑपरेटिंग और कलेक्शन के खर्च फिलहाल कुल सर्विस कॉस्ट का 40% से 50% तक बैठते हैं। AI का इस्तेमाल डॉक्यूमेंट प्रोसेसिंग, अंडरराइटिंग और कलेक्शन को ऑटोमेट करके, बैंक इन खर्चों को कम करना चाहते हैं और लोन को सस्ता बनाना चाहते हैं। इसका लक्ष्य कर्मचारियों को रूटीन कागजी कार्रवाई से हटाकर हाई-वैल्यू कस्टमर इंटरैक्शन पर फोकस कराना है।
भारत के बड़े आर्थिक लक्ष्यों से जुड़ा है यह कदम
यह ऑटोमेशन की ओर बढ़ता कदम भारत के लंबे समय के आर्थिक लक्ष्यों से भी जुड़ा है। 2047 तक $30 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए, बैंकिंग सेक्टर को नॉमिनल GDP ग्रोथ से 3.5% से 4% ज़्यादा एसेट ग्रोथ बनाए रखनी होगी। बैंक AI से उन प्रोडक्टिविटी गेन की उम्मीद कर रहे हैं जो पिछले डिजिटल प्रयासों से शायद नहीं मिल पाए, यानी वे कम संसाधनों में ज़्यादा काम करना चाहते हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम?
हालांकि, नई टेक्नोलॉजी को इतनी तेजी से अपनाने में कई बड़े जोखिम भी शामिल हैं जिन पर शेयरधारकों को गौर करना चाहिए। AI में बदलाव के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी और स्पेशलाइज्ड टैलेंट पर भारी कैपिटल खर्च करना होगा, और इसका असल रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) नज़दीकी भविष्य में अनिश्चित बना हुआ है। अगर बैंक इस खर्च को प्रभावी ढंग से मैनेज नहीं कर पाए, तो यह उनके मार्जिन पर भारी पड़ सकता है।
गवर्नेंस और ऑपरेशनल चुनौतियां
इसके अलावा, ऑपरेशनल और गवर्नेंस से जुड़े जोखिम भी हैं। AI पर निर्भर सिस्टम कभी-कभी बायस्ड या अपारदर्शी फैसले दे सकते हैं, जो रेगुलेटरी कंप्लायंस के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी करता है। जैसे-जैसे बैंक अपने कोर ऑपरेशंस को डिजिटल बना रहे हैं, वैसे-वैसे साइबर सिक्योरिटी के खतरे भी बढ़ रहे हैं। इस संदर्भ में, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में जोर दिया कि बैंकों को सिर्फ एडॉप्शन की स्पीड पर ही फोकस नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि असली सफलता गवर्नेंस, जवाबदेही और इस्तेमाल हो रहे सिस्टम की गहरी समझ पर निर्भर करती है, न कि सिर्फ टेक्नोलॉजी पर।
आगे क्या?
आखिरकार, इस AI ट्रांसफॉर्मेशन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक इन स्ट्रक्चरल बदलावों को कितनी अच्छी तरह मैनेज करते हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या बैंक साइबर सिक्योरिटी या प्रॉफिटेबिलिटी से समझौता किए बिना इन सॉल्यूशंस को सफलतापूर्वक स्केल कर पाते हैं। आने वाली तिमाही की फाइलिंग्स और मैनेजमेंट की टिप्पणियों में मुख्य रूप से इन AI पहलों पर खर्च किए गए कैपिटल और ऑपरेशनल कॉस्ट और एसेट क्वालिटी में मिले ठोस सुधारों के बीच संतुलन पर नज़र रखी जाएगी।
