IndiaAI Mission ने अब GPU की सीधी खरीद (Direct Procurement) का रास्ता चुना है। 45,000 से अधिक चिप्स लगाने के लक्ष्य से पीछे रहने और ग्लोबल सप्लाई चेन में आ रही बाधाओं के चलते सरकार ने यह बड़ा फैसला लिया है, ताकि प्राइवेट पार्टनर पर निर्भरता कम हो सके।
भारत के एआई (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए शुरू किए गए ₹10,372 करोड़ के IndiaAI Mission में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हालिया डेटा के मुताबिक, प्रोजेक्ट 45,000 चिप्स लगाने के लक्ष्य के मुकाबले फिलहाल केवल 30,000 से 38,000 GPU तक ही पहुंच पाया है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार अब पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बजाय खुद टेंडर निकालने की तैयारी में है।
सीधी खरीद क्यों जरूरी?
शुरुआत में यह काम प्राइवेट सेक्टर के जरिए होना था, लेकिन ग्लोबल सेमीकंडक्टर मार्केट में मची उथल-पुथल ने खेल बिगाड़ दिया। साल 2026 के दौरान AI चिप्स की कीमतें 15% से 23% तक बढ़ गई हैं, जिसके कारण प्राइवेट कंपनियां समय पर डिलीवरी देने में असमर्थ रहीं। अब सरकार का फोकस खुद की 'सॉवरेन कंप्यूट कैपेसिटी' (Sovereign Compute Capacity) बनाने पर है, ताकि ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतों से बचा जा सके।
हार्डवेयर रणनीति में बदलाव
सरकार अब सिर्फ एक कंपनी यानी Nvidia पर निर्भर रहने के बजाय 'हेटेरोजेनियस कंप्यूट' (Heterogeneous Compute) रणनीति अपना रही है। इसका मतलब है कि अब कई तरह के स्पेशलाइज्ड चिप्स का उपयोग किया जाएगा। भारत अब स्वदेशी डिजाइन और RISC-V जैसे प्रोजेक्ट्स पर भी जोर दे रहा है ताकि विदेशी हार्डवेयर पर निर्भरता कम हो और लागत को कंट्रोल किया जा सके।
IT सेक्टर और स्टार्टअप्स पर असर
यह कदम देश के आईटी (IT) और टेक सेक्टर के लिए अहम है। सरकार का मकसद एक सस्ता और विश्वसनीय क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना है, ताकि स्टार्टअप्स और रिसर्चर्स को सब्सिडी रेट्स पर कंप्यूट पावर मिल सके। फिलहाल कंप्यूटिंग की लागत ₹65 से ₹100 प्रति घंटा के आसपास है।
हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती ग्लोबल सप्लाई चेन की बनी हुई है। यदि सरकार के नए टेंडर से पर्याप्त हार्डवेयर नहीं मिल पाता है, तो घरेलू लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) के विकास में देरी हो सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार की यह नई टेंडर प्रक्रिया कैसे कंप्यूटिंग की कमी को दूर करती है और लागत को स्थिर रखती है।
