अमेरिकी सरकार के H-1B वीजा फीस को **$1,03,265** तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर भारत ने साफ कर दिया है कि वह इसमें कोई राजनयिक दखल नहीं देगा। भारत सरकार ने इसे अमेरिका का पूरी तरह से एक कमर्शियल मामला बताया है।
सरकार का स्टैंड साफ
अमेरिकी प्रशासन के इस नए प्रस्ताव के बाद भारत ने इसे राजनयिक मुद्दा मानने से साफ इनकार कर दिया है। पिछले वर्षों की तुलना में यह रुख काफी अलग है, क्योंकि पहले भारत ऐसे मामलों को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO) जैसे मंचों पर उठाता रहा है। सरकार के लिए यह अब केवल एक देश का अपना कमर्शियल निर्णय है।
IT कंपनियों पर क्या है खतरा?
अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी द्वारा प्रस्तावित यह फीस भारतीय IT सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। 2024 फाइनेंशियल ईयर में जारी कुल H-1B वीजा में से 71% भारतीय पेशेवरों को मिले थे। TCS, Infosys, Wipro और Tech Mahindra जैसी दिग्गज कंपनियां लंबे समय से इस वीजा कैटेगरी का इस्तेमाल करती आई हैं।
क्यों कम होगा असर?
अच्छी बात यह है कि भारतीय कंपनियां अब एक दशक पुरानी रणनीति पर निर्भर नहीं हैं। इन कंपनियों ने अब अमेरिका में लोकल टैलेंट हायरिंग बढ़ाई है, काम का बड़ा हिस्सा भारत में स्थित ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में शिफ्ट किया है और STEM प्रोग्राम्स में भारी निवेश किया है।
निवेशकों के लिए बड़ी बात
निवेशकों की चिंता इस बात पर है कि क्या कंपनियां इस लागत का बोझ अपने क्लाइंट्स पर डाल पाएंगी या फिर यह सीधे उनके ऑपरेटिंग मार्जिन को हिट करेगा। NASSCOM अभी भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रखे हुए है। हालांकि अभी यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और इसे अंतिम कानून बनने से पहले कई कानूनी चुनौतियों से गुजरना होगा, लेकिन निवेशकों को कंपनियों की भविष्य की वर्कफोर्स स्ट्रेटेजी पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
