भारत ने अपने सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण यानी 'Semicon 2.0' का ऐलान कर दिया है। सरकार का लक्ष्य अगले आठ सालों में देश में ही 3nm से 7nm तक के हाई-टेक चिप्स बनाना है। यह मिशन सिर्फ असेंबली तक सीमित नहीं है, बल्कि एक पूरा सप्लाई चेन इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम है।
भारत सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन के अगले चरण 'Semicon 2.0' को हरी झंडी दे दी है। पहले चरण में जहां फाउंडेशन और पैकेजिंग पर जोर था, वहीं अब भारत का लक्ष्य 3-nanometre से 7-nanometre तक के अत्याधुनिक चिप्स का निर्माण करना है। मौजूदा समय में भारत में 40-nanometre तकनीक का उपयोग हो रहा है, ऐसे में यह छलांग बेहद महत्वपूर्ण है।
छह स्तंभों वाली रणनीति (Six-Pillar Strategy)
सरकार इस बार एक आत्मनिर्भर इकोसिस्टम पर काम कर रही है। इसमें 6 मुख्य पिलर्स पर फोकस है: चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट, स्पेशलाइज्ड मटेरियल, एडवांस फैब्रिकेशन, ATMP/OSAT और रिसर्च। चिप बनाने में काम आने वाले 500 से ज्यादा खास केमिकल और गैसों को भी अब भारत में ही बनाने की योजना है, ताकि ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भरता कम हो सके।
अगस्त 2026 तक की स्थिति देखें, तो Micron, Kaynes और CG Power जैसी कंपनियों की फैसिलिटीज ने कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर दिया है। सरकार का इरादा 1 लाख डिजाइन इंजीनियर्स को तैयार करने का भी है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और जोखिम
निवेशकों को यह समझना होगा कि यह क्षेत्र काफी 'कैपिटल इंटेंसिव' है। एक एडवांस चिप फैसिलिटी सेटअप करने का खर्च $15 बिलियन तक जा सकता है। इतनी बड़ी लागत के बाद मुनाफे के लिए डिमांड की निरंतरता बहुत जरूरी है।
इसके अलावा, तकनीकी जोखिम भी कम नहीं हैं। 3nm की मैन्युफैक्चरिंग में मामूली चूक से बड़ा नुकसान हो सकता है। हाई-एंड चिप्स के लिए चौबीसों घंटे बिजली, भारी मात्रा में शुद्ध पानी और हाई-क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। निवेशकों को आने वाले समय में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि सेमीकंडक्टर सेक्टर का ग्लोबल कॉम्पिटिशन और साइक्लिक डिमांड काफी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
