भारत सरकार डेटा सेंटर सेक्टर में **$800 अरब** का बड़ा निवेश आकर्षित करने के लिए जमीन और बिजली से जुड़ी मंजूरियों को आसान बना रही है। एआई (AI) और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने की इस कोशिश के बीच निवेशकों को बिजली की कमी और ओवरसप्लाई जैसे रिस्क पर भी नजर रखनी होगी।
भारत अब ग्लोबल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का मुख्य हब बनने की राह पर है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में हुई एक राउंडटेबल बैठक के बाद सरकार ने उन बाधाओं को दूर करने का संकल्प लिया है, जो लंबे समय से प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बनी हुई थीं। इसमें जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण क्लीयरेंस और पावर कनेक्टिविटी जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं।\n\n### नीतिगत बदलाव और निवेश\n\nइस ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए सरकार ने विदेशी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे की घोषणा की है। वहीं, 'Taxation and Other Laws (Amendment) Bill 2026' के तहत 'स्पेसिफाइड डेटा सेंटर्स' की परिभाषा को और व्यापक बनाया गया है, जिससे डेवलपर्स की लागत कम होगी। लक्ष्य है कि 2030 तक कुल कैपेसिटी को 1.5 गीगावाट से बढ़ाकर 6.5 गीगावाट तक ले जाया जाए।\n\nइस रेस में Microsoft, Google और AWS जैसे ग्लोबल जायंट्स के साथ Reliance और Tata Group जैसे दिग्गज भी बड़े निवेश कर रहे हैं।\n\n### सेक्टर के सामने चुनौतियां और रिस्क\n\nबड़ी संभावनाओं के बावजूद सेक्टर में कुछ जमीनी रिस्क भी हैं:\n\n* इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी: डेटा सेंटर्स को बहुत ज्यादा बिजली और पानी की जरूरत होती है। कई इलाकों में ग्रिड पर पहले से दबाव है, जिससे प्रोजेक्ट्स के समय पर शुरू होने में दिक्कत आ सकती है।\n* ओवरसप्लाई का खतरा: कंपनियों द्वारा घोषित प्रोजेक्ट्स और असल में चालू होने वाली कैपेसिटी के बीच बड़ा गैप हो सकता है। अगर AI की डिमांड उम्मीद से धीमी रही, तो डेटा सेंटर्स के खाली रहने का खतरा है, जो डेवलपर्स के कर्ज को बढ़ा सकता है।\n\nनिवेशकों को सिर्फ बड़ी घोषणाओं को नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट्स के वास्तविक क्रियान्वयन (Execution), पावर-अप डेट्स और कंपनियों के डेट-टू-इक्विटी रेशियो को बारीकी से ट्रैक करना चाहिए।
