भारत अपने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को 2030 तक $500 अरब तक पहुंचाने की तैयारी में है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार अब फिनिश्ड गुड्स के साथ-साथ डोमेस्टिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर भी जोर दे रही है।
क्या है सरकार का प्लान?
भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है - साल 2030 तक $500 अरब का वार्षिक उत्पादन। इस बड़े लक्ष्य को दो हिस्सों में बांटा गया है: $400 अरब तैयार उत्पादों (finished goods) से और $100 अरब घरेलू कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग से। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए, सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) को और मजबूत किया है और स्थानीय सप्लाई चेन को बेहतर बनाने के लिए 75 नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। अब फोकस सिर्फ असेंबलिंग पर नहीं, बल्कि 'डिज़ाइन इन इंडिया' और स्वदेशी कंपोनेंट उत्पादन पर है ताकि वैल्यू चेन में ऊपर बढ़ा जा सके।
असेंबली से वैल्यू क्रिएशन की ओर बढ़ता कदम
पिछले कुछ सालों में भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर मुख्य रूप से असेंबली ऑपरेशंस, खासकर स्मार्टफोन्स की असेंबली पर निर्भर रहा है। इससे जहां लाखों नौकरियां पैदा हुईं और एक्सपोर्ट्स बढ़े, वहीं कंपोनेंट्स के लिए चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देशों पर निर्भरता बनी रही। यह निर्भरता घरेलू वैल्यू एडिशन को सीमित करती है और सप्लाई चेन में रुकावटों का खतरा बढ़ाती है। $500 अरब के लक्ष्य के लिए, कंपनियों को अब सिर्फ तैयार प्रोडक्ट्स को असेंबल करने से आगे बढ़कर प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs), डिस्प्ले मॉड्यूल और कैमरा मॉड्यूल जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स को भारत में ही बनाना होगा। यह बदलाव मुनाफा बढ़ाने के लिए ज़रूरी है, क्योंकि कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग असेंबली बिज़नेस की तुलना में ज़्यादा स्थिर मानी जाती है।
निवेशकों के लिए क्यों है खास?
कंपोनेंट लोकलाइजेशन (localization) पर जोर देने से भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं। कंपनियां वर्टिकल इंटीग्रेशन (vertical integration) में ज़्यादा निवेश कर रही हैं ताकि प्रोडक्ट की वैल्यू का बड़ा हिस्सा कैप्चर कर सकें। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और ECMS जैसी सरकारी योजनाओं से भारत में मैन्युफैक्चरिंग की लागत, जो पहले चीन या वियतनाम की तुलना में 8-10% ज़्यादा मानी जाती थी, धीरे-धीरे कम हो रही है। हालांकि, असली फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां इन नई कंपोनेंट फैसिलिटीज को कितनी कुशलता से बढ़ाती हैं और इकोनॉमीज़ ऑफ स्केल (economies of scale) हासिल करती हैं।
चुनौतियां और जोखिम
इस सेक्टर में ग्रोथ की अपार संभावनाओं के बावजूद, कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। कच्चे माल पर ज़्यादा इंपोर्ट ड्यूटी और घरेलू R&D क्षमताओं में कमी जैसी स्ट्रक्चरल समस्याएं मौजूद हैं। भले ही लेबर उपलब्ध है, लेकिन प्रोडक्टिविटी लेवल्स और चिप डिज़ाइन या प्रिसिजन इंजीनियरिंग जैसे स्पेशलाइज्ड एरियाज़ में स्किल्ड टैलेंट की कमी तेज़ ग्रोथ में बाधा बन सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में भारी कैपिटल इन्वेस्टमेंट की ज़रूरत होती है। अगर तेज़ कैपेसिटी एक्सपेंशन के लिए लिया गया कर्ज, उम्मीद के मुताबिक डिमांड या ऑपरेशनल एफिशिएंसी से कवर नहीं हो पाया, तो कैश फ्लो पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल ट्रेड में बदलाव, इंपोर्ट ड्यूटी में फेरबदल या फॉरेन सप्लाई चेन कंट्रोल्स भी घरेलू मैन्युफैक्चरर्स की लागत संरचना को प्रभावित कर सकते हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, निवेशकों को इन बातों पर नज़र रखनी चाहिए:
- कंपोनेंट लोकलाइजेशन रेट्स: देखें कि कितना सप्लाई डोमेस्टिकली सोर्स हो रहा है और कितना इंपोर्ट किया जा रहा है।
- ECMS यूटिलाइजेशन: हाल ही में मंजूर हुए प्रोजेक्ट्स की प्रगति और उनके कमीशनिंग टाइमलाइन्स पर नजर रखें।
- पॉलिसी कंटिन्यूटी: PLI इंसेंटिव्स या इंपोर्ट ड्यूटी स्ट्रक्चर में किसी भी बदलाव पर ध्यान दें, जो कच्चे माल की लागत को प्रभावित कर सकते हैं।
- EMS फर्म्स के मार्जिन: लिस्टेड इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स के ऑपरेटिंग मार्जिन के ट्रेंड्स देखें, इससे पता चलेगा कि वर्टिकल इंटीग्रेशन से प्रॉफिटेबिलिटी बढ़ रही है या नहीं।
