भारत ने ग्लोबल पार्टनरशिप के जरिए एक स्टेबल सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने पर जोर दिया है। **₹1.27 लाख करोड़** के 'Semicon 2.0' प्रोग्राम के साथ सरकार सप्लाई चेन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है।
ग्लोबल साझेदारी का नया दौर
Semicon India 2026 कॉन्फ्रेंस में फॉरेन सेक्रेटरी विक्रम मिस्री ने साफ किया कि भारत की रणनीति 'सिलेक्टिव आत्मनिर्भरता' की है। इसका मतलब है कि हम अकेले सबकुछ बनाने के बजाय ग्लोबल दिग्गजों के साथ मिलकर काम करेंगे। भारत अपनी चिप डिजाइनिंग और पैकेजिंग की ताकत का इस्तेमाल करेगा और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ पार्टनरशिप कर एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी देश में लाएगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रोडक्शन की रफ्तार
सरकार इस सेक्टर को लेकर काफी आक्रामक है। शुरुआती Semicon India प्रोग्राम के तहत ₹76,000 करोड़ के बजट से 12 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई थी। Micron, Kaynes, और CG Semi जैसी कंपनियां पहले ही कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर चुकी हैं, जो इस सेक्टर के लिए अच्छा संकेत है। अब ₹1.27 लाख करोड़ के Semicon 2.0 के जरिए इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर सेक्टर की नींव को और मजबूत किया जा रहा है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
सेमीकंडक्टर सेक्टर में निवेश लंबी अवधि का गेम है और इसमें कैपिटल की जरूरत बहुत ज्यादा होती है। यह एक हाई-स्टेक मौका है, जहां प्रोजेक्ट में देरी, लागत का बढ़ना और ग्लोबल कॉम्पिटिशन जैसे रिस्क हमेशा बने रहेंगे। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि Semicon 2.0 की एग्जीक्यूशन स्पीड क्या रहती है और नई यूनिट्स अपने प्रोडक्शन को कैसे स्केल करती हैं।
