भारत के स्पेस-टेक सेक्टर में साल **2026** के दौरान जबरदस्त हलचल देखने को मिली है। सरकारी सुधारों और नई पॉलिसी के दम पर इस क्षेत्र में **$332 मिलियन** की फंडिंग आई है, जिससे प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
बदलती तस्वीर और सरकारी सपोर्ट
भारत का स्पेस-टेक सेक्टर अब सरकारी नियंत्रण से निकलकर एक हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जिसमें ISRO के साथ-साथ 400 से ज्यादा प्राइवेट स्टार्टअप्स कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। Indian Space Policy 2023 और IN-SPACe की सक्रिय भूमिका ने इस पूरे इकोसिस्टम में क्लेरिटी लाने का काम किया है।
निवेश का नजरिया
यह सेक्टर फिलहाल लंबी अवधि के लिए एक 'बेट' (Bet) की तरह है। Skyroot Aerospace जैसे स्टार्टअप्स ने लॉन्च क्षमता में सुधार किया है, लेकिन ज्यादातर कंपनियां अभी भी R&D स्टेज पर हैं। सरकार ने SIDBI के जरिए फंड और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर देकर रिस्क को कम करने की कोशिश की है, लेकिन निवेशकों को यह याद रखना होगा कि यह एक बेहद 'कैपिटल-इंटेंसिव' सेक्टर है। $44 बिलियन का इंडस्ट्री साइज साल 2033 तक का अनुमान है, लेकिन यह सफलता इस पर निर्भर करेगी कि स्टार्टअप्स अपने तकनीकी माइलस्टोन को रिवेन्यू में कैसे बदलते हैं।
लिस्टेड कंपनियों के लिए मौका
रिटेल निवेशकों के लिए सीधे स्टार्टअप्स में निवेश करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन Larsen & Toubro (L&T), MTAR Technologies, और Hindustan Aeronautics Ltd (HAL) जैसी कंपनियां दशकों से ISRO की मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर रही हैं। ये कंपनियां स्टार्टअप्स की तुलना में कम रिस्की हैं क्योंकि इनका बिजनेस मॉडल ज्यादा डायवर्सिफाइड है।
निवेशकों को भविष्य में कंपनियों के कैश बर्न और लॉन्च की सफलता दर पर कड़ी नजर रखनी होगी, क्योंकि किसी भी बड़े फेलियर या फंडिंग सेंटीमेंट में बदलाव का असर सीधे वैल्युएशन पर पड़ सकता है।
