केंद्र सरकार ने पूरी तरह से स्वदेशी स्मार्टफोन बनाने के लिए अक्टूबर 2028 की डेडलाइन तय की है। यह कदम देश को केवल असेंबली हब से ऊपर उठाकर इंडिजिनस (स्वदेशी) इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का मालिक बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।
स्वदेशी तकनीक की ओर भारत का अगला कदम
आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, भारत अब केवल ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली सेंटर बनकर नहीं रहना चाहता। सरकार का लक्ष्य ऐसी तकनीक और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी विकसित करना है जो वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सके। मौजूदा समय में भारत की 5G हार्डवेयर और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) डिजाइन की बढ़ती क्षमताओं को देखते हुए यह एक बड़ा और साहसी फैसला है।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां और अवसर?
यह बदलाव भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को 'हाई-वॉल्यूम, लो-मार्जिन' असेंबली मॉडल से हटाकर 'डिजाइन-लेड' मैन्युफैक्चरिंग की ओर ले जाएगा। Dixon Technologies और Kaynes Technology जैसी कंपनियां जो अभी असेंबली में बड़ा नाम हैं, उन्हें अब रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर भारी खर्च करना होगा। हालांकि, शुरुआती दौर में इससे कंपनियों के कैश फ्लो पर असर पड़ सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह हाई-मार्जिन मुनाफे का रास्ता खोल सकता है।
ग्लोबल दिग्गजों से मुकाबला
बाजार में Apple और Samsung जैसे बड़े खिलाड़ियों का दबदबा है, जिनके पास विशाल बजट और मज़बूत सप्लाई चेन है। एक स्वदेशी ब्रांड को सिर्फ सस्ती कीमत ही नहीं, बल्कि बेहतर हार्डवेयर और विश्वसनीय सॉफ्टवेयर अनुभव भी देना होगा। निवेशकों को यह समझना होगा कि कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमर ब्रांड बनाने में ज़मीन-आसमान का अंतर है।
सरकार PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम के जरिए पूरा सपोर्ट दे रही है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब घरेलू कंपनियां कॉमर्शियल स्तर पर अपनी तकनीक को साबित कर पाएंगी। आने वाले समय में प्राइवेट सेक्टर का निवेश और सरकार के नए सपोर्टिव कदम ही इस बड़े बदलाव की दिशा तय करेंगे।
