भारत सरकार ने टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के दूसरे चरण का ऐलान किया है। इस मिशन के लिए **₹1.27 लाख करोड़** का भारी-भरकम बजट मंजूर किया गया है। ISM 2.0 का मकसद सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस करने के बजाय वेंचर कैपिटलिस्ट (VCs) के साथ मिलकर फंड जुटाना है, जिससे चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को बढ़ावा मिलेगा।
को-इन्वेस्टमेंट से बढ़ेगा फंड का दायरा
ISM के पहले चरण के विपरीत, जहाँ सरकार सीधे सब्सिडी दे रही थी, वहीं ISM 2.0 में एक को-इन्वेस्टमेंट मॉडल अपनाया गया है। इसके तहत, सरकार वेंचर कैपिटलिस्ट्स के साथ मिलकर फंड जुटाएगी। अधिकारियों का कहना है कि इस मॉडल का मकसद उन खास फर्मों को आकर्षित करना है जो सेमीकंडक्टर-ग्रेड गैस, केमिकल और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग टूल्स जैसे जरूरी इनपुट्स सप्लाई करती हैं। निवेशकों के लिए, यह एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश है जो सरकारी ग्रांट पर निर्भर रहने के बजाय खुद-ब-खुद चलता रहे।
डिजाइन और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पर ज़ोर
पहले चरण में जहाँ चिप असेंबली और टेस्टिंग में रुचि देखी गई थी, वहीं दूसरे चरण में चिप डिजाइनिंग की क्षमताओं पर खास ध्यान दिया जाएगा। सरकार उन प्रोजेक्ट्स को ज़्यादा सपोर्ट देने की योजना बना रही है जो 28 नैनोमीटर (nm) से छोटे टेक्नोलॉजी नोड्स का इस्तेमाल करके चिप्स बनाने पर काम करेंगे। ये एडवांस्ड नोड्स हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन इनमें तकनीकी जटिलता और भारी शुरुआती निवेश का बड़ा जोखिम भी शामिल है।
ओसीआई कार्डधारकों को भी मौका
सरकार ने इस योजना के तहत पात्रता के दायरे को भी बढ़ा दिया है। अब इसमें डोमेस्टिक फर्म्स, भारत में स्थापित विदेशी कंपनियों और ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्डहोल्डर्स को भी शामिल किया गया है। OCI कार्डहोल्डर्स को शामिल करने से सरकार को उम्मीद है कि अनुभवी टैलेंट और कैपिटल को आकर्षित किया जा सकेगा, जो अब तक ग्लोबल टेक्नोलॉजी हब में केंद्रित था। इससे भारतीय स्टार्टअप्स और ग्लोबल प्लेयर्स के बीच की खाई को पाटने में मदद मिलेगी।
जोखिम और निगरानी
निवेशकों के लिए इस सेक्टर में सबसे बड़ी चुनौती इन महंगे प्रोजेक्ट्स का सफल एग्जीक्यूशन है। सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के लिए लगातार कैपिटल, स्थिर बिजली, हाई-प्यूरिटी पानी और खास वर्कफोर्स की जरूरत होती है। हालाँकि सरकार वित्तीय सहायता दे रही है, लेकिन इन वेंचर्स की असली कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या प्राइवेट प्लेयर्स ऑपरेशनल लागत को मैनेज कर पाते हैं और दशकों के अनुभव वाले ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स से मुकाबला कर पाते हैं। नए इंसेंटिव गाइडलाइन्स का रोलआउट और कैपिटल डिप्लॉयमेंट की स्पीड पर नज़र रखना इस क्षेत्र के लिए अहम होगा।
