भारत सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM 2.0) के दूसरे चरण को हरी झंडी दे दी है। इस मिशन के लिए **₹1.27 लाख करोड़** का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है। इसका मकसद चिप बनाने वाली कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना है, जिसमें उन्हें **10%** से भी ज़्यादा की लागत बचत और अन्य इंसेंटिव्स का लाभ मिलेगा।
देश में चिप मैन्युफैक्चरिंग का महा-अभियान
भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर (Semiconductor) यानी चिप बनाने के क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' (ISM 2.0) की शुरुआत की है। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत सरकार ₹1.27 लाख करोड़ का बड़ा निवेश करेगी। यह मिशन सिर्फ चिप फैब्रिकेशन (Fabrication) और पैकेजिंग (Packaging) तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सेमीकंडक्टर डिजाइन (Design), ज़रूरी मटेरियल (Materials) और मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट (Manufacturing Equipment) तक एक पूरा इकोसिस्टम (Ecosystem) तैयार करने पर ज़ोर देगा। इतना ही नहीं, सरकार अगले 20 दिनों में ₹62,500 करोड़ की एक अलग मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (Mobile Manufacturing Scheme) भी लाने वाली है, जिससे देश में इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन को और मजबूती मिलेगी।
क्यों भारत बनेगा चिप का नया हब?
ISM 2.0 का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि यह ग्लोबल चिप मैन्युफैक्चरिंग हब्स के मुकाबले 10% से भी ज़्यादा की लागत बचत का वादा कर रहा है। मिशन के CEO, अमिनतेश कुमार सिन्हा के अनुसार, यह कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) केंद्र और राज्य सरकारों के इंसेंटिव्स (Incentives) और कम ऑपरेशनल खर्चों (Operational Costs) से संभव होगा। सरकार का प्लान है कि डेप्रिसिएशन-लिंक्ड इंसेंटिव्स (Depreciation-linked incentives) के ज़रिए कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) का एक बड़ा हिस्सा कवर किया जाए। इससे भारत में नई फैब्स (Fabs) को वैसी ही कॉस्ट स्ट्रक्चर (Cost Structure) हासिल करने में मदद मिलेगी, जैसी पुरानी, पूरी तरह डेप्रिशिएटेड (Depreciated) फैक्ट्रियों में दूसरे देशों में मिलती है। यह सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में नए प्लेयर्स के लिए एक बहुत बड़ी बाधा को दूर करेगा।
ऑपरेशनल एफिशिएंसी और स्टार्टअप्स को सपोर्ट
चिप बनाने की फैक्ट्रियों में एनर्जी (Energy) और लेबर कॉस्ट (Labor Cost) का बड़ा हिस्सा होता है। भारत में बिजली की दरें और मैनपावर (Manpower) बाकी देशों के मुकाबले कम हैं, जो कुल फैब कॉस्ट का करीब 17% और 13% बैठता है। इसी का फायदा उठाते हुए सरकार अपना पक्ष रख रही है। बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स के अलावा, ISM 2.0 सेमीकंडक्टर स्टार्टअप्स (Semiconductor Startups) के लिए एक को-इन्वेस्टमेंट मॉडल (Co-investment Model) भी ला रहा है। सरकार वेंचर कैपिटल फर्म्स (Venture Capital Firms) के साथ मिलकर शुरुआती स्टेज की कंपनियों के फाइनेंशियल रिस्क (Financial Risk) को कम करेगी। इसमें एडवांस डिजाइन टूल्स (Advanced Design Tools) और सीड फंडिंग (Seed Funding) जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं। सरकार का कहना है कि वह इन कंपनियों के रोज़मर्रा के कामकाज में दखल दिए बिना, एक पैसिव इन्वेस्टर (Passive Investor) की भूमिका निभाएगी।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
इन पहलों की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन्हें कितनी अच्छी तरह लागू किया जाता है और क्या ये लंबे समय तक प्राइवेट कैपिटल (Private Capital) को आकर्षित कर पाती हैं। हालांकि सरकार फाइनेंशियल फ्रेमवर्क (Financial Framework) तैयार कर रही है, पर इस इंडस्ट्री को टेक्निकल कॉम्प्लेक्सिटी (Technical Complexity), ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) पर निर्भरता और स्किल्ड वर्कफोर्स (Skilled Workforce) तैयार करने में लगने वाले समय जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। निवेशकों को प्रोजेक्ट कमीशनिंग टाइमलाइन्स (Project Commissioning Timelines), इंसेंटिव्स के वास्तविक डिस्बर्समेंट (Disbursement) और डोमेस्टिक कंपनियों की ग्लोबल चिप सप्लाई चेन्स में इंटीग्रेशन (Integration) की क्षमता पर नज़र रखनी चाहिए। जैसे-जैसे ये स्कीम्स नोटिफाई (Notify) होंगी, बाजार की नज़रें मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स की प्रगति और डिजाइन व इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग के नए सेगमेंट में ग्लोबल टेक्नोलॉजी फर्म्स और डोमेस्टिक स्टार्टअप्स की भागीदारी पर टिकी रहेंगी।
