भारत ने AI सुरक्षा के लिए एक नया और सख्त रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार किया है। ₹10,371 करोड़ के IndiaAI Mission का हिस्सा यह पहल ग्लोबल वॉलंटरी एग्रीमेंट्स से आगे बढ़कर फाइनेंस और टेक सेक्टर के लिए अनिवार्य सिक्योरिटी ऑडिट और टेस्टिंग को लागू करती है।
भारतीय सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए एक नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पेश किया है, जो वैश्विक स्तर पर प्रचलित स्वैच्छिक (voluntary) समझौतों से हटकर पूरी तरह से एक 'स्वदेशी' (indigenous) सुरक्षा मॉडल पर आधारित है। 30 सितंबर, 2026 को जारी ये नए नियम फाइनेंस और हेल्थकेयर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सिक्योरिटी ऑडिट और डेटा प्रोटेक्शन के लिए कड़े मानक तय करते हैं। यह कदम ₹10,371 करोड़ के 'IndiaAI Mission' के 'Safe & Trusted AI' स्तंभ का हिस्सा है।
ग्लोबल पैक्ट्स से आगे बढ़ना
दुनिया भर में जहाँ ज्यादातर AI नियम तकनीकी कंपनियों की मर्जी पर निर्भर करते हैं, वहीं भारत ने 'अनिवार्य कंप्लायंस' (mandatory compliance) का रास्ता चुना है। सरकार का मानना है कि पश्चिमी देशों के मानक भारत की भाषाई विविधता और सांस्कृतिक बारीकियों के लिए पर्याप्त नहीं हैं। नया सॉवरेन फ्रेमवर्क यह सुनिश्चित करेगा कि भारत में इस्तेमाल होने वाले AI सिस्टम स्थानीय माहौल के हिसाब से टेस्ट किए जाएं, जिससे भविष्य में बड़ी तकनीकी गलतियों को रोका जा सके।
फाइनेंस और टेक सेक्टर पर असर
निवेशकों के लिए यह बदलाव काफी मायने रखता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने AI आधारित साइबर खतरों को पहले ही वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम माना है, जिसके बाद अब कंपनियों को AI गवर्नेंस के लिए बोर्ड-लेवल की निगरानी रखनी होगी। कंपनियों को अब 'रेड-टीमिंग' (Red-teaming) जैसे सख्त सुरक्षा परीक्षणों और 'डेटा प्रोवेनेंस' (data provenance) यानी डेटा के मूल स्रोत की प्रमाणिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त संसाधन खर्च करने होंगे।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि यह कदम डिजिटल संप्रभुता के लिए अहम है, लेकिन कंपनियों के लिए कुछ चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। इनमें फाइनेंशियल फ्रॉड, ट्रांजैक्शन एरर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का खतरा शामिल है। साथ ही, देश में रिसर्च टैलेंट और GPU कंप्यूटिंग की कमी एक बड़ी बाधा है। 'BharatGen' जैसे प्रोजेक्ट्स इन सुरक्षा मानकों को विकास के दौरान ही जोड़ने पर काम कर रहे हैं। आने वाले दिनों में सेक्टर-विशिष्ट गाइडलाइन्स जारी होंगी, जो तय करेंगी कि कंपनियों को अपने सिस्टम को इन मानकों के अनुरूप बदलने में कितना समय और खर्च लगेगा।
