भारत में काम कर रहे रिटेल और कंज्यूमर Global Capability Centres (GCCs) में सीनियर AI लीडरशिप की भारी कमी देखने को मिल रही है। 180 सेंटर्स में सिर्फ **320** सीनियर एक्सपर्ट्स होने के कारण प्रोजेक्ट्स में देरी और सैलरी खर्च बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है।
बढ़ता AI एडॉप्शन और लीडरशिप का सूखा
भारत में रिटेल और कंज्यूमर GCCs में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल 2022 से अब तक दोगुना होकर वर्कफोर्स के 4.8% तक पहुंच गया है। लेकिन, इतनी रफ्तार के बावजूद कंपनियों को इन कॉम्प्लेक्स प्रोजेक्ट्स को संभालने के लिए अनुभवी लीडर्स नहीं मिल रहे हैं। यह समस्या अब सिर्फ हायरिंग तक सीमित नहीं रही, बल्कि बिजनेस की एफिशिएंसी के लिए बड़ा रिस्क बन गई है।
आंकड़ों में समझें गंभीरता
रिसर्च के मुताबिक, 180 GCCs में 8 साल से ज्यादा अनुभव वाले सिर्फ 320 सीनियर AI प्रोफेशनल्स हैं। यानी हर सेंटर के पास औसतन 2 से भी कम एक्सपर्ट्स हैं। इनमें से सिर्फ 15% यानी करीब 47 लोग ही AI आर्किटेक्ट्स या प्रिंसिपल साइंटिस्ट्स हैं, जो हाई-लेवल स्ट्रैटेजी बनाने में सक्षम हैं।
निवेशकों के लिए क्या हैं खतरे के संकेत?
- प्रोजेक्ट्स में देरी: करीब 60% GCCs ने माना है कि टैलेंट की कमी के कारण उनके प्रोडक्ट लॉन्च और गो-टू-मार्केट प्लान पिछड़ रहे हैं।
- मार्जिन पर दबाव: 45% सेंटर्स बजट की मार झेल रहे हैं। टैलेंट के लिए मची होड़ के चलते सैलरी का खर्च अनुमान से कहीं ज्यादा बढ़ गया है, जिसका सीधा असर प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ रहा है।
- ग्लोबल ऑपरेशंस पर असर: करीब 11% लीडर्स का कहना है कि अगर यह टैलेंट संकट हल नहीं हुआ, तो ग्लोबल हेडक्वार्टर इन प्रोजेक्ट्स को दूसरे देशों में शिफ्ट करने पर विचार कर सकते हैं।
अब कंपनियां हायरिंग के बजाय इंटरनल ट्रेनिंग पर पैसा खर्च कर रही हैं, जिससे डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन का समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं। निवेशकों को आने वाले समय में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी होगी कि वे कैसे इस टैलेंट क्राइसिस से निपट रहे हैं और इसका कंपनी के ऑपरेटिंग मार्जिन पर क्या असर पड़ रहा है।
