भारत सरकार ने Starlink की बाजार में एंट्री को लेकर मस्क के दावों को खारिज कर दिया है। सरकार ने साफ किया है कि सभी सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनियों को कड़े सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा।
आरोपों का खंडन
भारत सरकार ने अक्टूबर 2026 में एलन मस्क द्वारा लगाए गए उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि कुछ कॉर्पोरेट हित SpaceX की Starlink को भारतीय बाजार में आने से रोक रहे हैं। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और अन्य अधिकारियों ने इन दावों को निराधार बताया है। सरकार का स्पष्ट रुख है कि रेगुलेटरी फ्रेमवर्क सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वह कंपनी कहीं की भी हो।
लाइसेंस और सिक्योरिटी का पेंच
वर्तमान में Starlink, Jio Satellite Communications और Eutelsat OneWeb जैसी दिग्गज कंपनियों के पास Global Mobile Personal Communication by Satellite (GMPCS) लाइसेंस तो हैं, लेकिन कमर्शियल ऑपरेशंस शुरू करने के लिए जरूरी फाइनल सिक्योरिटी क्लियरेंस और स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट अभी बाकी है। सरकार का कहना है कि ये देरी सुरक्षा मानकों के कारण है, न कि किसी तरह के संरक्षणवाद (protectionism) के चलते।
रेगुलेटरी चुनौतियां और डेटा सुरक्षा
कंपनियों को अपना कामकाज शुरू करने के लिए स्थानीय स्तर पर यूजर डेटा स्टोर करने, लॉफुल इंटरसेप्शन प्रोटोकॉल और संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा के लिए जियो-फेंसिंग जैसी कड़ी शर्तों को पूरा करना होगा। सरकार विदेशी नियंत्रित सैटेलाइट नेटवर्क को क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मानती है।
स्पेक्ट्रम प्राइसिंग और फाइनेंशियल इम्पैक्ट
Department of Telecommunications (DoT) फिलहाल स्पेक्ट्रम प्राइसिंग मॉडल पर काम कर रहा है। चर्चाओं के अनुसार, सरकार 5% के रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल (AGR का हिस्सा) पर विचार कर रही है। निवेशकों के लिए यह मॉडल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि फाइनल स्पेक्ट्रम कॉस्ट सीधे तौर पर कंपनियों के कैपिटल एक्सपेंडिचर और प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित करेगी।
अब सबकी नजरें सरकार द्वारा स्पेक्ट्रम प्राइसिंग गाइडलाइंस के आधिकारिक ऐलान और सिक्योरिटी क्लियरेंस पर टिकी हैं।
