भारत की सॉवरेन क्लाउड पॉलिसी की परिभाषा बदल रही है। अब सिर्फ डेटा स्टोरेज ही काफी नहीं, बल्कि पूरे टेक्नोलॉजी स्टैक पर भारत का सीधा नियंत्रण होगा ताकि नेशनल सिक्योरिटी और फाइनेंशियल डेटा को विदेशी हस्तक्षेप से बचाया जा सके।
सॉवरेन क्लाउड पॉलिसी को लेकर छिड़ी बहस अब एक नए मोड़ पर है। अब मांग केवल इस बात की नहीं है कि डेटा भारत की धरती पर स्टोर हो, बल्कि इंडस्ट्री लीडर्स सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि टेक्नोलॉजी स्टैक, एन्क्रिप्शन कीज़ (Encryption Keys) और एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सेस पर पूरी तरह भारतीय नियंत्रण होना चाहिए।
सुरक्षा का नया मॉडल
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा मकसद डिफेंस, इंटेलिजेंस और फाइनेंशियल रिकॉर्ड्स जैसे संवेदनशील डेटा को किसी भी विदेशी कानूनी हस्तक्षेप से बचाना है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल 'डेटा रेजिडेंसी' काफी नहीं है, क्योंकि अगर इंफ्रास्ट्रक्चर का मालिकाना हक विदेशी कंपनियों के पास है, तो वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में आ सकता है।
अब एक 'टायर्ड' (Tiered) अप्रोच की वकालत की जा रही है:
- हाइली सेंसिटिव डेटा: इसके लिए डेडिकेटेड या ऑफलाइन 'एयर-गैप्ड' इंफ्रास्ट्रक्चर अनिवार्य होगा।
- कम संवेदनशील काम: इन्हें ग्लोबल क्लाउड प्रोवाइडर्स के साथ जारी रखा जा सकता है, बशर्ते वे विदेशी हस्तक्षेप को रोकने के लिए पुख्ता सुरक्षा तकनीक अपनाएं।
मार्केट और चुनौतियां
Gartner की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 तक ग्लोबल सॉवरेन क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का मार्केट $80 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। यह घरेलू आईटी कंपनियों के लिए एक बड़ा अवसर है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
सबसे बड़ी समस्या रेगुलेटरी तालमेल की है। MeitY को अब अपनी नई पॉलिसी को RBI और SEBI के मौजूदा नियमों के साथ जोड़ना होगा। अगर नियमों में एकरूपता नहीं आई, तो कंपनियों पर काम का बोझ बढ़ सकता है और इनोवेशन की रफ्तार धीमी हो सकती है। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि सरकार डेटा कैटेगरीज को कैसे परिभाषित करती है, क्योंकि इसी से तय होगा कि डोमेस्टिक आईटी फर्म्स इस बाजार का कितना बड़ा हिस्सा हासिल कर पाएंगी।
