AI Safety Framework: भारत ने ठुकराया अमेरिकी समझौता, अब खुद बनाएगा अपना AI नियम

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
AI Safety Framework: भारत ने ठुकराया अमेरिकी समझौता, अब खुद बनाएगा अपना AI नियम

भारत ने अमेरिका के नेतृत्व वाले AI सेफ्टी समझौते से दूरी बना ली है। सरकार अब अपनी डेमोग्राफिक और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों के हिसाब से एक नया 'टेक्नो-लीगल' रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करेगी, जिसका लक्ष्य डीपफेक और वर्नाक्यूलर मिसइन्फॉर्मेशन जैसी चुनौतियों से निपटना है।

भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के स्वैच्छिक (voluntary) AI सेफ्टी समझौते का हिस्सा नहीं बनेगी। इसके बजाय, भारत एक ऐसा घरेलू रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है जो भारतीय बाजार की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी मॉडल, जो कंपनियों की स्व-नियमन (self-regulation) पर आधारित है, भारत की जटिलताओं के लिए पूरी तरह मुफीद नहीं है।

क्यों है कस्टमाइज्ड अप्रोच की जरूरत?

भारतीय बाजार का बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय भाषाओं (vernacular languages) में टेक्नोलॉजी का उपयोग करता है। साथ ही, भारत का मुख्य फोकस बुनियादी मॉडल (Foundational Models) बनाने के बजाय मौजूदा AI का उपयोग करके बिजनेस सॉल्यूशंस विकसित करने पर है। Nasscom जैसे इंडस्ट्री बॉडीज का मानना है कि विदेशी फ्रेमवर्क की नकल करने से भारत की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां हल नहीं होंगी। यहाँ डीपफेक और गलत सूचनाओं का प्रसार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है।

'टेक्नो-लीगल' हाइब्रिड मॉडल का असर

सरकार अब एक दो-स्तरीय रेगुलेशन सिस्टम पर काम कर रही है। इसमें कम जोखिम वाली टेक्नोलॉजी कंपनियों को फ्लेक्सिबिलिटी दी जाएगी, ताकि इनोवेशन को बढ़ावा मिले। हालांकि, हेल्थकेयर, डिफेंस और सरकारी सेवाओं जैसे हाई-स्टेक सेक्टर में कड़ी और अनिवार्य जवाबदेही (mandatory compliance) होगी। यह कदम रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है, खासकर जून 2026 के बाद से, जब Anthropic जैसे मॉडल्स के अचानक निलंबन ने विदेशी निर्भरता के जोखिम को उजागर किया था।

निवेशकों के लिए संकेत

इन्वेस्टर्स के लिए यह एक बड़ा बदलाव है। भारतीय AI स्पेस में काम करने वाली कंपनियों को अब ग्लोबल मानकों के मुकाबले अलग कंप्लायंस स्टैंडर्ड्स का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि यह अप्रोच घरेलू इनोवेशन को सपोर्ट करने के लिए है, लेकिन क्रिटिकल सेक्टर में सख्त नियमों से ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकती है। अब बाजार की नजर सरकार के उस आगामी लेजिस्लेटिव ड्राफ्ट पर है, जो 'हाई-रिस्क' कैटेगरी और लायबिलिटी स्टैंडर्ड्स को स्पष्ट करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.