भारत सरकार ने अपने सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण के लिए **$13 बिलियन** के भारी-भरकम निवेश का ऐलान किया है। इसका मकसद देश की चिप आयात पर निर्भरता को कम करना और **2035** तक **$200 बिलियन** से अधिक की घरेलू मांग को पूरा करना है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
भारत फिलहाल अपनी 90-95% सेमीकंडक्टर जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जो ऑटोमोटिव से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर तक के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार का नया $13 बिलियन का पैकेज इसी निर्भरता को खत्म करने के लिए लाया गया है। इसके जरिए चिप डिजाइन, टेस्टिंग से लेकर फुल-स्केल मैन्युफैक्चरिंग तक का एक पूरा इकोसिस्टम तैयार करने की योजना है।
प्रमुख प्रोजेक्ट्स और टाटा का Dholera प्लांट
देश भर के 6 राज्यों में 12 सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिल चुकी है। अभी तक Micron, Kaynes Semicon और CG Semi जैसे खिलाड़ी असेंबली और टेस्टिंग (ATMP/OSAT) पर ध्यान दे रहे हैं। हालांकि, निवेशकों की सबसे ज्यादा नजर Tata Electronics और ताइवान की Powerchip (PSMC) के Dholera, गुजरात स्थित प्लांट पर है। यह भारत की पहली एडवांस वेफर फैब्रिकेशन फैसिलिटी है, जिससे दिसंबर 2026 तक पहली चिप आउटपुट की उम्मीद है।
सरकार की मदद और टैलेंट का संकट
सरकार प्रोजेक्ट कॉस्ट का 50% तक प्रोत्साहन दे रही है ताकि मैन्युफैक्चरिंग की भारी लागत को कम किया जा सके। लेकिन केवल पैसा काफी नहीं है; इंडस्ट्री को कुशल इंजीनियरों की जरूरत है। सरकार ने 1,00,000 सेमीकंडक्टर इंजीनियर तैयार करने का लक्ष्य रखा है, जिसमें से 85,000 लोग सितंबर 2026 तक ट्रेनिंग पूरी कर चुके हैं।
चुनौतियां और भविष्य की राह
असली इम्तिहान अब शुरू होगा। क्या ये प्लांट समय पर कमर्शियल लेवल पर उत्पादन शुरू कर पाएंगे? क्या वे ग्लोबल हब के साथ प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे? अगर Dholera जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में देरी हुई, तो सप्लाई चेन पर दबाव बना रहेगा। फिलहाल निवेशकों के लिए यह 'वॉच एंड वेट' का समय है क्योंकि अब पूरा ध्यान एक्जीक्यूशन की रफ्तार पर टिका है।
