Semicon 2.0: भारत चिप इकोसिस्टम को देगा बढ़ावा, डिजाइन से मैन्युफैक्चरिंग तक सरकारी सपोर्ट

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Semicon 2.0: भारत चिप इकोसिस्टम को देगा बढ़ावा, डिजाइन से मैन्युफैक्चरिंग तक सरकारी सपोर्ट

भारत सरकार 'सेमीकॉन 2.0' (Semicon 2.0) नाम से एक नई योजना ला रही है। इस योजना का मकसद सिर्फ चिप फैब्रिकेशन (Chip Fabrication) पर फोकस करने के बजाय, चिप डिजाइन स्टार्टअप्स, मटेरियल सप्लाई करने वाली कंपनियों और इक्विपमेंट बनाने वालों को भी बढ़ावा देना है। इसका लक्ष्य एक पूरी तरह से घरेलू सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन तैयार करना है।

वैल्यू चेन में इंसेंटिव का विस्तार

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (India Semiconductor Mission) के CEO, अमिश कुमार सिन्हा (Amitesh Kumar Sinha) के अनुसार, नई पॉलिसी में सेमीकंडक्टर डिजाइन स्टार्टअप्स और जरूरी इनपुट्स (Essential Inputs) बनाने वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा। इसमें सेमीकंडक्टर-ग्रेड केमिकल्स, इंडस्ट्रियल गैस और स्पेशल मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं। इन सहायक उद्योगों (Ancillary Industries) को सपोर्ट करके, सरकार भारत में सिर्फ चिप असेंबलिंग (Chip Assembling) से आगे बढ़कर एक ऐसी लोकल इकोसिस्टम बनाना चाहती है, जहाँ प्रोडक्शन के लिए जरूरी मटेरियल और टूल्स भी देश में ही तैयार हों।

पहले फेज की सफलता पर निर्माण

यह अपडेट पहले फेज की सफलता के बाद आया है, जिसमें चिप लाइफसाइकिल के विभिन्न चरणों में 12 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली थी। इसमें माइक्रोन (Micron) के असेंबली और टेस्ट प्लांट के साथ-साथ सीजी पावर (CG Power), रेनेसास (Renesas) और काइन्स सेमीकॉन (Kaynes Semicon) की फैसिलिटीज शामिल हैं। टेस्टिंग, असेंबली और पैकेजिंग के लिए एक बेस तैयार हो चुका है, और नए फेज का लक्ष्य लोकल सप्लायर्स को इंटीग्रेट करके और डोमेस्टिक रिसर्च कैपेबिलिटीज को बढ़ावा देकर इस फाउंडेशन को और मजबूत करना है।

रणनीतिक महत्व और जोखिम

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए, इंपोर्टेड हाई-टेक कंपोनेंट्स पर निर्भरता कम करना एक बड़ा लॉन्ग-टर्म लक्ष्य है। इससे ट्रेड बैलेंस (Trade Balance) सुधरेगा और सप्लाई चेन की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग (Semiconductor Manufacturing) में भारी पूंजी (Capital Intensive) लगती है और प्रोजेक्ट्स के प्रॉफिटेबल होने में लंबा समय लगता है। सरकारी इंसेंटिव शुरुआती वित्तीय बाधाओं को कम करते हैं, लेकिन कंपनियों की सफलता उनकी कॉम्प्लेक्स मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस को एक्जीक्यूट करने, मटेरियल के लिए हाई-प्योरिटी स्टैंडर्ड्स बनाए रखने और ग्लोबल प्लेयर्स से कॉम्पिटिशन करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।

भविष्य के देखने योग्य बातें

निवेशक फाइनल पॉलिसी में घोषित किए जाने वाले स्पेसिफिक इंसेंटिव स्ट्रक्चर्स (Incentive Structures) पर नजर रख सकते हैं। ये सीधे तौर पर पार्टिसिपेटिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन्स (Profit Margins) और कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) प्लान को प्रभावित करेंगे। इसके अलावा, डोमेस्टिक स्टार्टअप्स की प्रोडक्शन स्केल-अप करने और ग्लोबल चिपमेकर्स (Chipmakers) की जरूरी क्वालिटी रिक्वायरमेंट्स (Quality Requirements) को पूरा करने की क्षमता प्रोग्राम की लॉन्ग-टर्म इफेक्टिवनेस (Effectiveness) का एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर होगी। अगला बड़ा अपडेट पॉलिसी का ऑफिशियल रोलआउट (Rollout) और उन एलिजिबल कंपनियों का डिस्क्लोजर (Disclosure) होगा, जिन्हें इन बढ़े हुए सरकारी ग्रांट्स (Grants) का फायदा मिलेगा।

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