भारत के टेक सेक्टर में GenAI और क्लाउड टैलेंट की भारी किल्लत है। विशेषज्ञों के अनुसार, यहां **53% से 60%** तक टैलेंट गैप बना हुआ है। अब एंट्री-लेवल सैलरी भी **₹11.2 लाख** तक पहुंच गई है, जिससे निवेशकों की चिंताएं बढ़ रही हैं कि बढ़ता वेतन बिल कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को कम कर सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ में बने रहने के लिए भारतीय IT कंपनियों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। 'TeamLease Digital' की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, क्लाउड कंप्यूटिंग में 55-60% और जेनरेटिव AI (GenAI) भूमिकाओं में 53% टैलेंट की कमी देखी जा रही है। टैलेंट की इस भारी किल्लत ने कंपनियों के लिए कॉस्ट स्ट्रक्चर को पूरी तरह बदल दिया है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?
जैसे-जैसे AI इंजीनियरों की मांग बढ़ रही है, कंपनियां भारी सैलरी पैकेज देने पर मजबूर हैं। आंकड़े बताते हैं कि GenAI क्षेत्र में एंट्री-लेवल डेवलपर्स की सालाना सैलरी अब ₹11.2 लाख तक पहुंच गई है, जबकि 6 से 8 साल के अनुभव वाले प्रोफेशनल्स ₹34.5 लाख से अधिक कमा रहे हैं। वेतन में यह तेज बढ़ोतरी सीधे कंपनियों के 'एम्प्लॉयी बेनिफिट एक्सपेंस' को बढ़ा रही है, जो ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल रही है।
बड़े दिग्गजों पर असर
Tata Consultancy Services (TCS), Infosys, Wipro, और HCL Technologies जैसी बड़ी कंपनियां इस बदलाव के केंद्र में हैं। इन दिग्गज कंपनियों को अब केवल रेवेन्यू ग्रोथ ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी ध्यान देना पड़ रहा है कि वे कितनी कुशलता से अपने वेज बिल को मैनेज कर रही हैं।
आगे की राह
साल 2028 तक GenAI डेवलपर्स की मांग में और भी तेजी आने की उम्मीद है। यदि ये कंपनियां अपने मौजूदा वर्कफोर्स को तेजी से अपस्किल नहीं कर पाती हैं, तो उन्हें महंगे एक्सटर्नल हायरिंग पर निर्भर रहना पड़ेगा। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे आने वाली तिमाही नतीजों में 'एट्रिशन रेट' (attrition rate) और 'रेवेन्यू के मुकाबले एम्प्लॉयी कॉस्ट' जैसे मैट्रिक्स पर बारीकी से नजर रखें, क्योंकि यही तय करेंगे कि कंपनियां मार्जिन के दबाव को कितना झेल पा रही हैं।
