भारत में मौजूद **2,100** से ज्यादा Global Capability Centres (GCCs) अब बैक-ऑफिस सपोर्ट से बदलकर AI-आधारित इनोवेशन हब बन रहे हैं। यह बदलाव मल्टीनेशनल कंपनियों को भारत में ही R&D और प्रोडक्ट रोडमैप तैयार करने की ताकत दे रहा है, जो IT सेक्टर के लिए एक बड़ा संकेत है।
भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का परिदृश्य पूरी तरह बदल रहा है। अब तक ये केंद्र सिर्फ मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) के लिए लागत कम करने वाले 'डिलीवरी हब' के तौर पर जाने जाते थे, लेकिन अब ये 'ग्लोबल वैल्यू सेंटर्स' बन रहे हैं। इनके पास बजट की शक्ति है और ये Generative AI और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला रहे हैं।
आंकड़ों की जुबानी:
फिलहाल भारत में 2,100 से अधिक GCCs हैं, जिनमें करीब 23 लाख प्रोफेशनल काम कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि अब नई कंपनियां अपने भारतीय सेंटर्स को पहले ही दिन से AI मैंडेट और प्रोडक्ट ओनरशिप के साथ लॉन्च कर रही हैं। यह सिर्फ रूटीन टेक्निकल काम तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल R&D और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की जिम्मेदारी अब भारतीय हब उठा रहे हैं।
IT सेक्टर पर असर:
इस बदलाव के दो बड़े पहलू हैं। पहला, यह सेक्टर 2030 तक करीब $100 बिलियन की सालाना कमाई का लक्ष्य रख रहा है, जो भारत की ग्लोबल टेक स्थिति को मजबूत करता है। दूसरी तरफ, इससे IT कंपनियों के लिए चुनौती बढ़ गई है। जब बड़ी कंपनियां अपना काम 'इन-हाउस' करने लगेंगी, तो बड़ी IT सर्विस फर्मों को अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव लाना होगा और ज्यादा कॉम्प्लेक्स कामों पर ध्यान देना होगा।
रिस्क फैक्टर और चुनौतियां:
तेजी के साथ चुनौतियां भी हैं। टैलेंट की भारी कमी एक बड़ा रोड़ा है, जिसके कारण करीब 60% GCCs के प्रोजेक्ट्स में देरी हुई है। साथ ही, ऑटोमेशन के कारण मौजूदा काम का 55% हिस्सा प्रभावित हो सकता है। अगर भारत ने टैलेंट और लीडरशिप गैप को जल्दी नहीं भरा, तो कंपनियों के पास दूसरे देशों की ओर रुख करने का रिस्क भी बना रहेगा।
