भारत सरकार जल्द ही 'सेमिकॉन 2.0' (Semicon 2.0) लॉन्च करने जा रही है। इस नई पहल के तहत, सिर्फ चिप मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बल्कि चिप डिजाइन स्टार्टअप्स और जरूरी मटेरियल सप्लाई करने वाली कंपनियों को भी वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसका मकसद देश में एक आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन तैयार करना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
पूरी सप्लाई चेन को मिलेगी मजबूती
भारत सरकार अपनी सेमीकंडक्टर पहल के दूसरे चरण, यानी 'सेमिकॉन 2.0' को लाने की तैयारी में है। पहले चरण में जहां बड़े पैमाने पर चिप फैब्रिकेशन और असेंबली यूनिट्स को आकर्षित करने पर जोर था, वहीं अब इस नए संस्करण का दायरा बढ़ाया गया है। अब पूरे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को प्रोत्साहन मिलेगा। इसमें चिप डिजाइन स्टार्टअप्स के साथ-साथ आधुनिक चिप उत्पादन के लिए जरूरी खास केमिकल्स, गैसों और कच्चे माल के घरेलू निर्माताओं को भी सपोर्ट दिया जाएगा।
लोकल प्रोडक्शन का लक्ष्य
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के सीईओ, अमिश कुमार सिन्हा के अनुसार, सरकार का लक्ष्य सिर्फ असेंबली लाइनों से आगे बढ़कर एक मजबूत सप्लाई चेन बनाना है। एक मॉडर्न सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट के लिए लगभग 200 से 250 खास केमिकल और मटेरियल इनपुट्स की जरूरत होती है, जिनमें से ज्यादातर फिलहाल आयात किए जाते हैं। इन सप्लायर्स को प्रोत्साहन देकर, सरकार चाहती है कि वे भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग बेस स्थापित करें। इससे लॉजिस्टिक्स और इंपोर्ट से जुड़े खर्चों में कमी आएगी, जिससे घरेलू फैब्रिकेटर्स के लिए उत्पादन लागत कम हो सकती है।
मौजूदा प्रोजेक्ट्स की स्थिति
मिशन के पहले चरण में चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन और पैकेजिंग पर केंद्रित 12 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिल चुकी है। कई बड़ी फैसिलिटीज में काम तेजी से चल रहा है। उदाहरण के लिए, माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) की असेंबली और टेस्ट फैसिलिटी, साथ ही पैकेजिंग के लिए सीजी पावर-रेनेसास (CG Power-Renesas) और कायेन्स सेमीकॉन (Kaynes Semicon) के प्रोजेक्ट्स पहले ही प्रोडक्शन स्टेज में पहुंच चुके हैं। ये प्रोजेक्ट्स उस व्यापक इकोसिस्टम की नींव रखते हैं, जिसे अब सरकार 'सेमिकॉन 2.0' के जरिए सपोर्ट करना चाहती है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों के लिए यह बदलाव इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत की औद्योगिक क्षमताओं को गहरा करने की एक लंबी अवधि की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, सेमीकंडक्टर सेक्टर में भारी पूंजी निवेश की जरूरत होती है और मैन्युफैक्चरिंग के लिए हाई-प्रिसिजन स्टैंडर्ड्स चाहिए। इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाली कंपनियों, खासकर छोटी डिजाइन फर्मों और केमिकल सप्लायर्स को टेक्नोलॉजी एडॉप्शन, हाई ऑपरेशनल कॉस्ट और कुशल कार्यबल की जरूरत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। साथ ही, इन प्रोत्साहनों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे शुरुआती डिजाइन और पूर्ण-स्तरीय वाणिज्यिक उत्पादन के बीच की खाई को कितनी प्रभावी ढंग से पाटते हैं। इस क्षेत्र पर नजर रखने वाले निवेशक, अंतिम नियमों की घोषणा के बाद विशिष्ट नीति विवरण और पात्रता मानदंडों पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि यही तय करेंगे कि नई पहलों से कौन सी कंपनियां और क्षेत्र मुख्य रूप से लाभान्वित होंगे।
