साल 2027 तक भारत को करीब **4,650** फॉरवर्ड डिप्लॉयड इंजीनियर्स (FDE) की जरूरत है, जबकि अभी सिर्फ **900** अनुभवी प्रोफेशनल ही मौजूद हैं। टैलेंट की इस भारी कमी के कारण सैलरी में हर साल **15-25%** का उछाल आ सकता है, जिससे आईटी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
भारत अब ग्लोबल एआई टैलेंट मार्केट का हब बनता जा रहा है, और इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका 'फॉरवर्ड डिप्लॉयड इंजीनियर' (FDE) निभा रहे हैं। ये केवल कोडिंग नहीं करते, बल्कि बिजनेस टीमों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि एआई सिस्टम असल ऑपरेशंस में प्रभावी ढंग से काम करे।
टैलेंट की किल्लत और निवेश का गणित
UnearthInsight की रिपोर्ट के मुताबिक, अभी भारत में सिर्फ 900 अनुभवी FDE हैं। 2027 तक यह मांग बढ़कर 4,650 तक पहुंचने का अनुमान है। निवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि जिन कंपनियों के पास बेहतर टैलेंट रिटेंशन स्ट्रैटेजी होगी, वे ही बाजार में टिक पाएंगी, जबकि बाकी कंपनियों को ऊंचे वेतन बिल का सामना करना पड़ेगा।
आईटी सेक्टर के मार्जिन पर खतरा
स्पेशलाइज्ड टैलेंट की कमी के कारण FDE की सैलरी पारंपरिक सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स से 30% से 60% अधिक है। सीनियर प्रोफेशनल्स सालाना ₹68 लाख से ₹1.1 करोड़ तक का पैकेज ले रहे हैं। रिपोर्ट का मानना है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ ही अनुभवी FDE की सैलरी में हर साल 15-25% की बढ़ोतरी हो सकती है। आईटी फर्मों के लिए चुनौती यह है कि वे इन खर्चों को ग्राहकों पर कितना डाल पाती हैं, क्योंकि इसका सीधा असर उनके नेट प्रॉफिट और ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ेगा।
क्या है असली जोखिम?
रिपोर्ट के अनुसार, FDE के नाम पर निकाली जा रही 75-80% जॉब पोस्टिंग भ्रामक हो सकती हैं, जो अक्सर केवल पुराने रोल्स को नया नाम देती हैं। असली टैलेंट ढूंढना और उसे प्रशिक्षित करना कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती है। फिलहाल, बेंगलुरु, हैदराबाद और एनसीआर इस टैलेंट के मुख्य केंद्र बने हुए हैं। निवेशकों को अब आईटी कंपनियों की हायरिंग पॉलिसी पर नजर रखनी होगी कि कैसे वे मार्जिन को बचाते हुए अपनी एआई टीम का विस्तार करती हैं।
