India Electronics: ₹7,877 करोड़ निवेश से डिजाइन-आधारित मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ा कदम

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Electronics: ₹7,877 करोड़ निवेश से डिजाइन-आधारित मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ा कदम

भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर अब केवल पुर्जे जोड़ने (असेंबली) से आगे बढ़कर डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग (IDM) की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। ₹7,877 करोड़ के नए निवेश के साथ, कंपनियां सेमीकंडक्टर और इंजीनियरिंग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं बढ़ा रही हैं। सरकार की ₹40,000 करोड़ की प्रोत्साहन योजना इस बदलाव को गति दे रही है।

भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स का बदलता चेहरा

भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पहले जहां कंपनियां केवल पुर्जे असेंबल करने का काम करती थीं, वहीं अब वे इंटीग्रेटेड डिजाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग (IDM) मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। हाल ही में, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग के लिए 31 नए प्रस्तावों को मंजूरी मिली है, जिनमें कुल ₹7,877 करोड़ का निवेश किया जाएगा। इस कदम का मकसद आयातित पुर्जों पर निर्भरता कम करना और भारतीय निर्माताओं को वैल्यू चेन में ऊपर ले जाना है, ताकि वे साधारण असेंबली से हटकर कस्टम-निर्मित, हाई-वैल्यू उत्पाद बना सकें।

सरकारी नीतियों का सहारा

इस रणनीतिक बदलाव को सरकार की 'इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम' (ECMS) जैसे बड़े नीतिगत समर्थन का सहारा मिला है। इस स्कीम के तहत ₹40,000 करोड़ का बजट रखा गया है, जिसका उद्देश्य सेमीकंडक्टर, क्लाउड-इंटीग्रेटेड हार्डवेयर और विशेष इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में स्थानीय क्षमताएं बनाने के लिए कंपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में, इस सेक्टर का उत्पादन लगभग ₹13.11 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो 15.8% की वृद्धि दर्शाता है। हालांकि, अब फोकस सिर्फ उत्पादन की मात्रा से हटकर गुणवत्ता और इनोवेशन पर आ गया है।

IDM मॉडल के फायदे और चुनौतियां

इंटीग्रेटेड मॉडल अपनाने से कंपनियां प्रोडक्ट डेवलपमेंट प्रक्रिया के हर पहलू को नियंत्रित कर पाएंगी, जिसमें चिप डिजाइन से लेकर फाइनल सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन तक शामिल है। UST और क्रिटिकल मैन्युफैक्चरिंग जैसी कंपनियों के बीच हालिया साझेदारी इस ट्रेंड को और मजबूत कर रही है। ये कंपनियां AI-संचालित सिस्टम को फैक्ट्री फ्लोर पर एकीकृत कर रही हैं, जिससे 'स्मार्ट फैक्ट्रियां' अधिक कुशल बनेंगी और पहले जो काम बाहर से कराया जाता था, वह अब देश में ही होगा।

हालांकि, निवेशकों के लिए इस बदलाव में कुछ खास बातों पर नज़र रखना ज़रूरी है। पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) मॉडल में अक्सर मुनाफे का मार्जिन कम होता है, जो आमतौर पर 4% से 6% के बीच रहता है। IDM मॉडल से ज्यादा वैल्यू हासिल करने की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में बड़े और निरंतर निवेश की आवश्यकता होगी। इससे कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है, इससे पहले कि उन्हें अपने डिजाइनों से फायदा मिलना शुरू हो।

निवेशकों के लिए खास बातें

इसके अलावा, एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) भी एक बड़ा फैक्टर है। हाई-एंड कंपोनेंट्स विकसित करने के लिए विशेष प्रतिभा और लंबे समय तक चलने वाले पूंजी निवेश की जरूरत होती है, जिसे साधारण असेंबली लाइनों की तुलना में बढ़ाना मुश्किल होता है। साथ ही, कई कंपनियां अभी भी ग्राहक एकाग्रता (Customer Concentration) का सामना कर रही हैं, जहां उनका बड़ा रेवेन्यू कुछ ही ग्लोबल ब्रांड्स से आता है। अगर ये बड़े कॉन्ट्रैक्ट दोबारा तय होते हैं या हाथ से निकल जाते हैं, तो कमाई पर गंभीर असर पड़ सकता है।

निवेशकों के लिए, सरकार द्वारा मंजूर किए गए नए प्रोजेक्ट्स का वास्तव में शुरू होना सबसे महत्वपूर्ण होगा। यह देखना होगा कि क्या ये कंपनियां अपने बैलेंस शीट को भारी कर्ज या लागत बढ़ने के जोखिम में डाले बिना, हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग की ओर सफलतापूर्वक बढ़ पाती हैं। इस सफलता के लिए, टेक्नोलॉजी-आधारित इनोवेशन की ओर बढ़ने और भारतीय मैन्युफैक्चरिंग के जमीनी हकीकत के बीच संतुलन बनाना अहम होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.