भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पिछले एक दशक में 7 गुना बढ़ा है। FY26 में कुल प्रोडक्शन ₹13.11 लाख करोड़ रहा, जो FY15 के ₹1.9 लाख करोड़ से काफी ज्यादा है। इसमें मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग का योगदान सबसे बड़ा है, जिसका उत्पादन 33 गुना बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ तक पहुंच गया। यह देश को ग्लोबल सप्लाई चेन के लिए सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने में मदद करेगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में बंपर ग्रोथ
पिछले 10 सालों में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने कमाल की तरक्की की है। ऑफिशियल आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 (FY26) तक कुल इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन करीब ₹13.11 लाख करोड़ के आंकड़े को छू गया। यह साल 2015 (FY15) के ₹1.9 लाख करोड़ के मुकाबले एक बड़ी छलांग है। इस दौरान सेक्टर से एक्सपोर्ट भी 11 गुना से ज्यादा बढ़कर ₹4.24 लाख करोड़ हो गया।
मोबाइल सेक्टर का जलवा
इस जबरदस्त इंडस्ट्रियल ग्रोथ का सबसे बड़ा श्रेय मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग को जाता है। पिछले दशक में मोबाइल प्रोडक्शन 33 गुना बढ़ा है, जो FY15 में करीब ₹18,000 करोड़ से बढ़कर FY26 में ₹6.27 लाख करोड़ तक पहुंच गया। एक्सपोर्ट में भी इसका असर दिखा, जो ₹1,500 करोड़ से बढ़कर ₹2.59 लाख करोड़ हो गया। यह सब सरकारी स्कीम्स का नतीजा है, जिन्होंने बड़ी ग्लोबल कंपनियों को भारत में बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है।
सेमीकंडक्टर हब बनने की राह
सिर्फ असेंबलिंग से आगे बढ़कर, सरकार 'सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम' के तहत लोकल सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन बनाने पर जोर दे रही है। Micron और Sahasra जैसी कंपनियां मेमोरी डिवाइस जैसे DRAM, NAND Flash मेमोरी और सॉलिड-स्टेट ड्राइव्स का प्रोडक्शन शुरू कर चुकी हैं। दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सर्वर और डेटा सेंटर की बढ़ती मांग के कारण स्पेशलाइज्ड चिप्स की जरूरत बनी हुई है। इससे मेमोरी कंपोनेंट्स की कीमतें बढ़ी हैं और सप्लाई में टाइटनेस आ गई है, जो नए डोमेस्टिक प्लेयर्स के लिए एक चुनौतीपूर्ण लेकिन फायदेमंद माहौल बना रहा है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
सरकार अब 'सेमीकॉन 2.0' प्रोग्राम के जरिए चिप फैब्रिकेशन और असेंबली में और ज्यादा इन्वेस्टमेंट लाना चाहती है। निवेशकों के लिए इस सेक्टर का फ्यूचर इस बात पर निर्भर करेगा कि डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स वैल्यू एडिशन में कितनी तरक्की करते हैं। सिंपल असेंबली से निकलकर ज्यादा कॉम्प्लेक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ना इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा माइलस्टोन होगा। निवेशकों को नए चिप फैब्रिकेशन प्रोजेक्ट्स की रफ्तार, स्किल्ड लेबर की उपलब्धता और ग्लोबल टेक्नोलॉजी खर्चों में उतार-चढ़ाव के बावजूद एक्सपोर्ट डिमांड कितनी स्थिर रहती है, इन बातों पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही, सरकारी इंसेंटिव और इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन को कैसे प्रभावित करते हैं, यह भी देखना अहम होगा।
