Deeptech Funding का रिकॉर्ड! 2025 में ₹2.96 अरब डॉलर जुटाए, AI और EV का दबदबा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Deeptech Funding का रिकॉर्ड! 2025 में ₹2.96 अरब डॉलर जुटाए, AI और EV का दबदबा

भारत के डीपटेक (Deeptech) सेक्टर ने 2025 में रिकॉर्ड **$2.96 बिलियन** की फंडिंग हासिल की है। यह तब हुआ जब बाकी स्टार्टअप फंडिंग में नरमी देखी गई। यह दिखाता है कि निवेशकों का AI, EV और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में इंटरेस्ट बढ़ा है, जो अब कुल वेंचर कैपिटल (VC) एक्टिविटी का **15%** हिस्सा हैं। हालांकि, इस सेक्टर में ग्रोथ तो है, लेकिन निवेशकों को लंबे डेवलपमेंट साइकल और पूंजी निकालने में आने वाली मुश्किलों जैसे जोखिमों पर भी नज़र रखनी होगी।

डीपटेक फंडिंग में आया रिकॉर्ड उछाल

2025 में भारत की डीपटेक (Deeptech) कंपनियों ने रिकॉर्ड $2.96 बिलियन की फंडिंग जुटाई है। यह एक बड़ी कामयाबी है, खासकर तब जब बाकी स्टार्टअप इकोसिस्टम में मंदी का माहौल रहा। इस बढ़त से यह साफ है कि निवेशक नई और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि यह ट्रेंड 2026 में भी जारी रहेगा, जहाँ साल के मध्य तक ही 103 डील्स में करीब $1 बिलियन की फंडिंग हो चुकी है।

वेंचर कैपिटल (VC) में बड़ा बदलाव

भारत में वेंचर कैपिटल (VC) का परिदृश्य बदल रहा है। पहले डीपटेक, जिसमें AI, सेमीकंडक्टर, स्पेस टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड मटेरियल जैसी चीजें शामिल हैं, का रोल कम था। लेकिन अब यह फोकस का बड़ा केंद्र बन गया है। आंकड़े बताते हैं कि डीपटेक अब भारत में कुल वेंचर कैपिटल (VC) और प्राइवेट इक्विटी (PE) एक्टिविटी का लगभग 15% हिस्सा है, जबकि 2016 में यह सिर्फ 4% था। यह बदलाव साधारण कंज्यूमर इंटरनेट मॉडल्स से हटकर, जटिल और रिसर्च-आधारित बिजनेसेज की ओर इशारा करता है, जिनमें खास इंजीनियरिंग और लंबा डेवलपमेंट टाइम लगता है।

कैपिटल की ज़रूरतें और ग्रोथ स्टेज

फंडिंग के आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर पैसा बाद के स्टेज (later stages) में लगा है। सीरीज C (Series C) और फॉलो-ऑन राउंड्स (follow-on rounds) कुल डील्स का सिर्फ 7% होने के बावजूद, 2025 में कुल निवेश का 35% इन्हीं में गया। यह डीपटेक बिजनेसेज की हकीकत को दिखाता है: उन्हें लैब-स्केल टेस्टिंग से कमर्शियल प्रोडक्शन तक ले जाने के लिए भारी भरकम पैसों की ज़रूरत होती है। बड़े और धैर्यवान कैपिटल के लगातार सपोर्ट के बिना, ये कंपनियाँ अपने ऑपरेशन्स को प्रभावी ढंग से स्केल करने में संघर्ष करती हैं।

चुनौतियाँ और निवेशकों के जोखिम

हालांकि ग्रोथ के आंकड़े सकारात्मक हैं, पर इस सेक्टर में कुछ खास मुश्किलें हैं जिनसे निवेशकों को वाकिफ रहना चाहिए। सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है 'एग्जिट विजिबिलिटी' (exit visibility) यानी पैसा वापस मिलने की संभावना। लगभग 62% इन्वेस्टमेंट फंड्स, पब्लिक लिस्टिंग या अधिग्रहण जैसे स्पष्ट एग्जिट पाथवे (exit pathway) की कमी को एक बड़ा जोखिम मानते हैं। कंज्यूमर बिजनेसेज के विपरीत जो तेज़ी से स्केल हो सकते हैं, डीपटेक वेंचर्स में अक्सर बहुत लंबा 'जेस्टेशन पीरियड' (gestation period) होता है, जिसका मतलब है कि निवेशकों को अपने पैसे पर रिटर्न देखने के लिए कई साल इंतज़ार करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, यह इकोसिस्टम स्पेशलाइज्ड टैलेंट की कमी से जूझ रहा है। एक्सपर्ट्स का पूल बहुत सीमित है जो बहुत तकनीकी और खास प्रोजेक्ट्स का मूल्यांकन कर सकें। इससे निर्णय लेना मुश्किल हो सकता है, और कुछ मामलों में, सरकारी सहायता प्राप्त रिसर्च और इनोवेशन फंड्स के आवंटन में हितों के टकराव (conflicts of interest) की चिंताएँ भी उठाई गई हैं।

सरकारी सहायता और भविष्य का अनुमान

सरकारी नीतियाँ इस सेक्टर के लिए एक बड़ा सपोर्ट बनी हुई हैं। ₹1 लाख करोड़ का रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन (RDI) फंड और इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 (India Semiconductor Mission 2.0) जैसी पहलें निवेश के जोखिम को कम करने और घरेलू चिप मैन्युफैक्चरिंग व एडवांस्ड रिसर्च के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने के लिए बनाई गई हैं। इन कंपनियों की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे प्रायोगिक तकनीक से विश्वसनीय, बड़े पैमाने पर कमर्शियल प्रोडक्ट्स तक पहुँच पाती हैं या नहीं, जो ग्लोबल विकल्पों के साथ मुकाबला कर सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.