India Data Centre Sector: ग्रोथ के अनुमान घटे, 3-3.6 GW तक सीमित! जानिए क्या है वजह

TECHNOLOGY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
India Data Centre Sector: ग्रोथ के अनुमान घटे, 3-3.6 GW तक सीमित! जानिए क्या है वजह

Axis Capital की एक नई रिपोर्ट ने भारत के डेटा सेंटर सेक्टर के लिए ग्रोथ के अनुमानों को कम कर दिया है। पावर कनेक्टिविटी और जरूरी उपकरण मिलने में हो रही देरी को इसकी मुख्य वजह बताया गया है। AI और क्लाउड की डिमांड अभी भी मजबूत है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इस दशक के मध्य तक क्षमता 3-3.6 GW तक ही पहुँच पाएगी। ऐसे में निवेशकों को पावर इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर चलाने वाली कंपनियों पर इन दिक्कतों के असर पर पैनी नजर रखनी होगी।

डेटा सेंटर की ग्रोथ पर बदले अनुमान

भारत का डेटा सेंटर उद्योग अपने विस्तार की समय-सीमा में बदलाव देख रहा है। Axis Capital की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस दशक के मध्य तक देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता अब 3-3.6 गीगावाट (GW) तक पहुँचने का अनुमान है। यह पहले के उन अनुमानों से थोड़ा कम है, जिनके मुताबिक 2030 तक 6-8 GW क्षमता विकसित होने की उम्मीद थी। हालांकि, इन बदले हुए अनुमानों के बावजूद, मौजूदा करीब 1.3-1.4 GW के ऑपरेशनल बेस से क्षमता दोगुनी से ज्यादा होने की राह पर है।

डेवलपमेंट में आ रही हैं ये बाधाएं

विकास की धीमी रफ्तार का मुख्य कारण मांग की कमी नहीं, बल्कि ऑपरेशनल चुनौतियां हैं। डेवलपर्स को हाई-कैपेसिटी ट्रांसफार्मर और पावर जेनरेटर जैसे जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर जुटाने में काफी देरी का सामना करना पड़ रहा है। कुछ उपकरणों की लीड टाइम दो साल तक पहुँच गई है। इसके अलावा, स्थानीय ग्रिड से हाई-कैपेसिटी, रिडंडेंट पावर कनेक्शन लेने में 18 महीने तक लग सकते हैं, जो नए प्रोजेक्ट्स के लिए एक बड़ी रुकावट बन रहा है। इन देरी के चलते, Adani Connex, CtrlS और Jio जैसे प्रमुख ऑपरेटर्स द्वारा प्लान किए गए 3.4-3.6 GW के पाइपलाइन में से लगभग 40% ही सामान्य तीन से चार साल के बिल्डिंग साइकिल में ऑपरेशनल हो पाएगा।

AI-रेडी इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती लागत

जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बड़े भाषा मॉडल (Large Language Model) वर्कलोड्स की मांग बढ़ रही है, डेटा सेंटर अधिक जटिल डिजाइन की ओर बढ़ रहे हैं। इन AI-रेडी सुविधाओं के लिए लिक्विड कूलिंग सिस्टम, ज्यादा पावर डिस्ट्रीब्यूशन और मजबूत स्ट्रक्चरल बिल्ड की जरूरत होती है, जिससे कैपिटल खर्च बढ़ रहा है। इन एडवांस्ड सेंटर्स को डेवलप करने में प्रति मेगावाट ₹480 मिलियन से ₹540 मिलियन का खर्च आने का अनुमान है, जो स्टैंडर्ड सुविधाओं की तुलना में 10-15% ज्यादा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 से 2030 के बीच भारत के डेटा सेंटर बिल्ड-आउट के लिए कुल निवेश ₹1.31-1.66 लाख करोड़ रहने का अनुमान है, जिसमें जमीन और आईटी हार्डवेयर की लागत शामिल नहीं है।

पावर और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट सप्लायर्स पर असर

ऑपरेटर्स इन जोखिमों से जूझ रहे हैं, वहीं जरूरी इलेक्ट्रिकल उपकरणों की मांग बनी हुई है। ABB India, Siemens, Hitachi Energy India और CG Power जैसी कंपनियां जो पावर डिस्ट्रीब्यूशन और मैनेजमेंट सिस्टम बनाती हैं, वे इन प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी कंपोनेंट्स सप्लाई करने की स्थिति में हैं। इसके अलावा, रिन्यूएबल एनर्जी - जैसे सोलर और विंड - का इंटीग्रेशन एक स्टैंडर्ड रिक्वायरमेंट बनता जा रहा है। ग्रिड पावर के साथ रिन्यूएबल एनर्जी को जोड़कर, मुंबई जैसे हाई-कॉस्ट इलाकों में ऑपरेटर्स अपनी बिजली की लागत प्रति यूनिट ₹2-3 तक कम कर सकते हैं। इससे लॉन्ग-टर्म ऑपरेशनल मार्जिन में सुधार होगा और उनके हाइपरस्केल क्लाइंट्स के लिए सस्टेनेबिलिटी टारगेट्स भी पूरे होंगे।

इस सेक्टर को ट्रैक करने वाले निवेशकों को यह देखना होगा कि ऑपरेटर्स सप्लाई चेन की देरी और जमीन अधिग्रहण की चुनौतियों से कितनी सफलतापूर्वक निपट पाते हैं, क्योंकि यही कारक क्षमता के वास्तविक रोलआउट की गति तय करेंगे। 2030 तक मार्केट डिमांड का 90% हिस्सा कवर करने वाले हाइपरस्केलर्स की ओर बदलाव भी इन बड़े पैमाने के प्रोजेक्ट्स के लिए लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट स्टेबिलिटी का एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.