भारत में डेटा सेंटर की क्षमता **2026** तक **1.57 GW** पहुंच गई है, जो **2030** तक **9 GW** तक जाने का अनुमान है। AI और क्लाउड की बढ़ती डिमांड के बीच निवेशकों को बिजली, पानी की खपत और सख्त नियमों जैसे जोखिमों पर नजर रखनी चाहिए।
तेजी से बढ़ता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर
भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से आकार ले रहा है। साल 2020 में जहां यह क्षमता केवल 375 MW थी, वह 2026 के मध्य तक 1,575 MW के आंकड़े को पार कर गई है। Amazon Web Services (AWS), Nxtra और AdaniConneX जैसी बड़ी कंपनियों के भारी निवेश के कारण 2030 तक इसके 9 GW से 17 GW तक पहुंचने की उम्मीद है। इसका मुख्य कारण AI, 5G और क्लाउड कंप्यूटिंग की बेतहाशा मांग है।
बिजली और पानी: सबसे बड़ी रुकावट
तेजी से होता विस्तार अब ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना कर रहा है। डेटा सेंटर्स को 24/7 बिजली और कूलिंग के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। अनुमान है कि 2031-32 तक बिजली की मांग 13 GW से ज्यादा हो जाएगी, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ेगा।
वहीं, पानी की खपत एक बड़ा मुद्दा है। एक 100 MW का डेटा सेंटर रोजाना 20 लाख लीटर पानी तक इस्तेमाल कर सकता है। 2030 तक पूरे सेक्टर की सालाना खपत 3,580 करोड़ लीटर तक पहुंचने का अनुमान है, जो शहरी क्षेत्रों में पानी की कमी का कारण बन सकती है। कूलिंग के लिए नई तकनीकें अपनाने से कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ना तय है।
सरकारी नियमों का शिकंजा
नियामक सख्ती अब बढ़ रही है। कई प्रोजेक्ट्स को पर्यावरणीय मंजूरी और शोर-शराबे (नॉइज़ पॉल्यूशन) जैसे मुद्दों के कारण देरी का सामना करना पड़ रहा है। सस्टेनेबिलिटी पर जोर बढ़ने के साथ, कंप्लायंस लागत (Compliance Cost) में इजाफा हो सकता है, जिससे प्रोजेक्ट्स के पूरा होने में देरी और लागत बढ़ सकती है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे केवल रेवेन्यू ग्रोथ ही नहीं, बल्कि कंपनियों के रिसोर्स मैनेजमेंट और सरकारी अनुपालन को भी बारीकी से ट्रैक करें।
