भारत में डेटा सेंटर मार्केट में जबरदस्त हलचल है। कंपनियां अब बनने से पहले ही स्पेस बुक कर रही हैं, जिससे प्री-लीज़िंग क्षमता बढ़कर **1.2 गीगावाट (GW)** हो गई है। एआई (AI) की बढ़ती मांग के कारण सप्लाई काफी टाइट है, जो इस डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक बड़ा गेम चेंजर साबित हो रहा है।
भारत में डेटा सेंटर बनाने और उसे रेंट पर देने का बिजनेस अब पूरी तरह बदल चुका है। पहले कंपनियां डेटा सेंटर तैयार होने का इंतजार करती थीं, लेकिन आज एआई (AI) के लिए कंप्यूट पावर की रेस इतनी तेज है कि कंपनियां प्लानिंग या जमीन अधिग्रहण के दौरान ही जगह बुक (Pre-lease) कर रही हैं। यह ट्रेंड इतना मजबूत है कि प्री-लीज़िंग क्षमता जो पहले लगभग 550 मेगावाट (MW) थी, वह अब बढ़कर 1.2 गीगावाट (GW) तक पहुंच गई है।
एआई का असर और सप्लाई की कमी
इस तेजी के पीछे Amazon Web Services, Microsoft और Google जैसे ग्लोबल टेक दिग्गज हैं, जिन्हें एआई एप्लिकेशन चलाने के लिए बड़े और भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। फिलहाल ऑपरेशनल क्षमता 1.8 GW तक पहुंच गई है, जबकि वैकेंसी रेट गिरकर 2.8% के रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। रेडी-टू-यूज़ स्पेस न मिलने के कारण अब कंपनियां सालों पहले ही इंफ्रास्ट्रक्चर लॉक करने पर मजबूर हैं।
कैपिटल खर्च और पावर की चुनौती
निवेशकों के लिए यह सिक्के का दूसरा पहलू है। जहां प्री-लीज़िंग से डेवलपर्स की भविष्य की कमाई सुरक्षित होती है, वहीं इन सेंटर्स को बनाने के लिए भारी मात्रा में कैपिटल खर्च होता है। Adani Enterprises जैसी बड़ी कंपनियां अपने AdaniConneX के जरिए आक्रामक निवेश कर रही हैं, लेकिन यह विस्तार अक्सर भारी कर्ज पर निर्भर है। अगर प्रोजेक्ट में देरी होती है, तो रिटर्न पर असर पड़ना तय है।
इसके अलावा, सबसे बड़ी चुनौती पावर ग्रिड कनेक्टिविटी है। एआई-रेडी सेंटर्स को बहुत ज्यादा बिजली चाहिए, और कई जगहों पर मौजूदा ग्रिड इस लोड को उठाने में संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में जमीन और बिल्डिंग होने के बावजूद, बिजली कनेक्शन न मिलने से प्रोजेक्ट्स में लंबा विलंब हो सकता है।
रेगुलेटरी और फ्यूचर रिस्क
मई 2027 से लागू होने वाले Digital Personal Data Protection (DPDP) नियमों के कारण भी कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है। नियमों का पालन न करने पर भारी जुर्माने और कामकाज में रुकावट आ सकती है। भविष्य के लक्ष्यों पर नजर डालें तो 2030 तक 5.6 GW से 9 GW क्षमता का टारगेट रखा गया है। निवेशकों को केवल कैपेसिटी अनाउंसमेंट पर ध्यान देने के बजाय, कंपनी के प्रोजेक्ट समय पर पूरा करने की क्षमता, बिजली सप्लाई की सुरक्षा और उनके कर्ज प्रबंधन की बारीकी से जांच करनी चाहिए।
