भारत में डेटा-सेंटर की क्षमता 2030 तक **8 GW** तक पहुंचने की उम्मीद है, जिससे लोकल सेमीकंडक्टर हार्डवेयर के लिए बड़ा बाजार तैयार हो रहा है। बड़े मैन्युफैक्चरर्स के साथ-साथ अब छोटी कंपनियां भी पावर मैनेजमेंट और ऑप्टिकल इंटरकनेक्ट जैसे निश सेक्टर में पैर जमा रही हैं, हालांकि भारी निवेश की जरूरत निवेशकों के लिए एक चुनौती बनी हुई है।
भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से विस्तार के दौर में है। साल 2026 तक 1.5 से 1.8 GW रहने वाली डेटा-सेंटर क्षमता, 2030 तक 5.6 GW से 8 GW के स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। यह ग्रोथ अब सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए एक कैटलिस्ट का काम कर रही है, जहां फोकस सिर्फ AI चिप्स से हटकर जरूरी सपोर्टिव हार्डवेयर पर शिफ्ट हो रहा है।
AI के बाहर की दुनिया: सपोर्टिंग कंपोनेंट्स की मांग
हाइपरस्केल डेटा-सेंटर्स को चलाने के लिए केवल प्रोसेसर काफी नहीं हैं। पावर-मैनेजमेंट इंटीग्रेटेड सर्किट्स, सिक्योरिटी हार्डवेयर और हाई-स्पीड इंटरकनेक्ट्स जैसे पुर्जों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कंपनियां अब 'पिक्स एंड शवल्स' (पिक और फावड़ा) वाली रणनीति अपना रही हैं। LightSpeed Photonics जैसी कंपनियां सिलिकॉन फोटोनिक्स और 'नियर-पैकेज्ड ऑप्टिक्स' पर काम कर रही हैं ताकि बैंडविड्थ की समस्या को सुलझाया जा सके। साथ ही, डेटा सिक्योरिटी के लिए हार्डवेयर-आधारित एन्क्रिप्शन पर भी जोर दिया जा रहा है।
बड़े प्लेयर्स और सप्लाई चेन
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) जैसे दिग्गजों द्वारा ढोलेरा, गुजरात और असम में फैब्रिकेशन यूनिट्स और असेंबली फैसिलिटीज लगाने से एक मजबूत सप्लाई चेन तैयार हो रही है। यह घरेलू कंपनियों के लिए थर्मल मैनेजमेंट और एज-कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में अपनी जगह बनाने का सुनहरा मौका है।
निवेशकों के लिए चेतावनी: कैपिटल और वैलिडेशन
सेमीकंडक्टर और डेटा-सेंटर का बिजनेस 'कैपिटल-इंटेंसिव' है, यानी इसमें भारी-भरकम रकम की शुरुआती जरूरत होती है। इसके अलावा, हार्डवेयर को क्लाउड प्रोवाइडर्स के उपयोग के लिए कड़े टेस्टिंग प्रोसेस से गुजरना पड़ता है। अगर कोई स्टार्टअप समय पर सर्टिफिकेशन हासिल नहीं कर पाता है या वैश्विक स्तर पर AI की डिमांड में सुस्ती आती है, तो फाइनेंशियल दबाव बढ़ सकता है। आर्थिक अस्थिरता के कारण फंडिंग में सख्ती का जोखिम भी बना हुआ है।
क्या ट्रैक करें?
निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो प्रोटोटाइप से कमर्शियल सप्लाई की ओर बढ़ रही हैं। साथ ही, सरकारी नीतियों, सेमीकंडक्टर इंसेंटिव्स, और डेटा-सेंटर क्षमता विस्तार की वास्तविक रफ्तार को ट्रैक करना जरूरी है ताकि यह देखा जा सके कि कंपनियां कर्ज के बोझ के बावजूद मुनाफे को कैसे बनाए रखती हैं।
