भारत में डेटा सेंटर कैपेसिटी तेजी से बढ़ रही है और 2030 तक यह **9 गीगावाट** तक पहुँचने का अनुमान है। इस डिजिटल विस्तार के साथ ही बढ़ती बिजली की मांग और फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता अब निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन रही है।
ऊर्जा खपत की चुनौती
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भारत के लिए एक बड़ी ऊर्जा चुनौती लेकर आया है। प्रोजेक्शन के मुताबिक, भारत की डेटा सेंटर कैपेसिटी अभी के 1.4 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक 9 गीगावाट हो जाएगी। साल 2030 तक, अकेले डेटा सेंटर्स भारत की कुल बिजली खपत का करीब 3% हिस्सा ले सकते हैं। निवेशकों के लिए यह एक जटिल स्थिति है क्योंकि एआई (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग को चौबीसों घंटे विश्वसनीय पावर सप्लाई की जरूरत होती है।
फॉसिल फ्यूल और ESG का जोखिम
निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता बिजली के स्रोत को लेकर है। वर्तमान ग्लोबल प्रोजेक्शन बताते हैं कि इन सेंटर्स को चलाने के लिए कोयले और नेचुरल गैस पर निर्भरता बनी रहेगी। जिन निवेशकों और कंपनियों के लिए ESG (Environmental, Social, and Governance) के नियम सख्त हैं, उनके लिए यह फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता एक बड़ा रिस्क है। यदि रिन्यूएबल एनर्जी की ओर शिफ्ट नहीं हुआ, तो आने वाले समय में कंपनियों को रेगुलेटर्स और ग्लोबल स्टेकहोल्डर्स के भारी दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
निवेशक क्यों हैं सतर्क?
Reuters Institute की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एआई और क्लाइमेट चेंज को लेकर लोगों में उत्साह तो है, लेकिन इसके ऊर्जा ट्रेड-ऑफ पर चर्चा बहुत कम है। निवेशकों के लिए अब सिर्फ डेटा सेंटर का विस्तार देखना काफी नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि ये कंपनियां ग्रीन एनर्जी की ओर कितनी तेजी से बढ़ रही हैं। जो कंपनियां ऊर्जा-कुशल कूलिंग और हार्डवेयर टेक्नोलॉजी में निवेश करेंगी, वे भविष्य में रेगुलेटरी रिस्क से बेहतर ढंग से निपट सकेंगी, जबकि पुरानी तकनीकों पर निर्भर रहने वाली कंपनियों की लागत और स्क्रूटनी बढ़ सकती है।
