VPN कंपनियों के लिए भारत में नया नियम! सरकार का बड़ा कदम, अब लोकल ऑफिस होना जरूरी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
VPN कंपनियों के लिए भारत में नया नियम! सरकार का बड़ा कदम, अब लोकल ऑफिस होना जरूरी

भारत सरकार वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) प्रोवाइडर्स के लिए नए नियम बनाने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन नियमों के तहत VPN कंपनियों को देश में अपना लोकल ऑफिस खोलना पड़ सकता है और कंप्लायंस ऑफिसर की नियुक्ति भी करनी होगी।

क्या है सरकार का प्लान?

भारत सरकार वीपीएन (VPN) सर्विस देने वाली कंपनियों को रेगुलेट करने के लिए एक नया लीगल फ्रेमवर्क तैयार कर रही है। इस नए नियम के तहत, कंपनियों के लिए यह ज़रूरी हो सकता है कि वे भारत में अपना फिजिकल ऑफिस स्थापित करें और सरकार के साथ समन्वय के लिए लोकल कंप्लायंस ऑफिसर की नियुक्ति करें। सरकार का मानना है कि 2022 में बनाए गए CERT-In के डेटा स्टोरेज नियमों का भी पूरी तरह पालन नहीं हुआ है, और इस नए कदम से कंटेंट मॉडरेशन और डेटा सिक्योरिटी के नियमों को लागू कराने में मदद मिलेगी।

क्यों बदले नियम?

2022 में, CERT-In ने वीपीएन कंपनियों के लिए कुछ खास कस्टमर डेटा, जैसे आईपी एड्रेस और पर्सनल जानकारी, को लंबे समय तक स्टोर करने का निर्देश दिया था। इस नियम के बाद, NordVPN, ExpressVPN, Surfshark और Proton VPN जैसी कई बड़ी कंपनियों ने भारत से अपने सर्वर हटा लिए थे और ट्रैफिक को दूसरे देशों के सर्वर से रूट करना शुरू कर दिया था। अब सरकार यह चाहती है कि इन कंपनियों को देश के कानूनों का पालन करना ही पड़े, इसलिए यह नया नियम लाया जा रहा है।

सरकार की चिंताएं

सरकारी अधिकारियों ने चिंता जताई है कि वीपीएन का इस्तेमाल वेबसाइटों, एप्लीकेशन्स और अन्य ऑनलाइन कंटेंट पर लगे सरकारी बैन को बायपास करने के लिए किया जा रहा है। लोकल ऑफिस और कंप्लायंस ऑफिसर होने से सरकार को इन कंपनियों से सीधे संपर्क करने और नियमों को लागू कराने में आसानी होगी। सूत्रों का कहना है कि यह नया ढांचा IT रूल्स, 2021 के जैसा हो सकता है, जो पहले से ही बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लागू होता है। नियमों का पालन न करने पर कंपनियों के लोकल रिप्रेजेंटेटिव्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की भी बात चल रही है।

प्राइवेसी और सिक्योरिटी का सवाल

वीपीएन के रेगुलेशन में नेशनल सिक्योरिटी और यूजर प्राइवेसी के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। जहां सरकार इन्हें कंटेंट मॉडरेशन और डेटा सिक्योरिटी नीतियों को कमजोर करने का जरिया मानती है, वहीं वीपीएन कंपनियां कहती हैं कि स्ट्रिक्ट लॉगिंग और लोकल स्टोरेज की ज़रूरतें उनके यूजर प्राइवेसी और एनोनिमिटी के मॉडल के खिलाफ हैं। भारत से सर्वर हटाने का कंपनियों का पिछला अनुभव दिखाता है कि ग्लोबल प्राइवेसी स्टैंडर्ड्स और डोमेस्टिक रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट्स के बीच टकराव की संभावना बनी रहेगी।

आगे क्या?

निवेशकों और इंडस्ट्री को इस नए कानून के ड्राफ्ट का इंतज़ार रहेगा, खासकर कंप्लायंस की ज़रूरतों और जुर्माने के प्रावधानों पर। बिल के औपचारिक रूप से पेश होने के बाद यह साफ हो जाएगा कि वीपीएन प्रोवाइडर्स को भारतीय बाजार में बने रहने के लिए अपने ऑपरेशंस में क्या बदलाव करने होंगे। साथ ही, यह देखना भी अहम होगा कि ग्लोबल वीपीएन फर्में लोकल एंटिटी स्थापित करती हैं या ऑफशोर सर्वर के जरिए काम करना जारी रखती हैं, क्योंकि इसी पर उनका भारत में भविष्य का बिजनेस मॉडल टिका होगा।

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