साल 2026 के पहले हाफ (H1) में भारतीय सेमीकंडक्टर स्टार्टअप्स ने **$76.8 मिलियन** यानी करीब **₹6,400 करोड़** से ज़्यादा की फंडिंग जुटाई है। यह पैसा कम, लेकिन बड़ी और मैच्योर डील्स में आया है, जो सेक्टर में निवेशकों के बढ़ते भरोसे को दिखाता है। सरकारी योजनाओं का भी इसमें बड़ा हाथ है।
क्यों आया फंडिंग में उछाल?
साल 2026 के पहले छह महीनों में भारतीय सेमीकंडक्टर कंपनियों ने $76.8 मिलियन (लगभग ₹6,400 करोड़) की फंडिंग हासिल की है। यह सिर्फ़ ज़्यादा डील्स की वजह से नहीं हुआ, बल्कि निवेशकों के अप्रोच में बड़े बदलाव का नतीजा है। डील्स की संख्या भले ही स्थिर रही हो, लेकिन हर डील का साइज़ काफी बढ़ा है। इसका मतलब है कि निवेशक अब उन कंपनियों में बड़ा दांव लगा रहे हैं, जिनके पास बाज़ार में उतरने की मजबूत क्षमता है।
प्रोटोटाइप से आगे, कमर्शियल सप्लाई तक का सफर
इस फंडिंग के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि कई भारतीय स्टार्टअप अब सिर्फ चिप डिज़ाइन से आगे बढ़कर AI सिलिकॉन, फोटोनिक्स और OSAT (Outsourced Semiconductor Assembly and Test) जैसी खास फील्ड्स में काम कर रहे हैं। निवेशक उन कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो प्रोटोटाइप स्टेज से आगे निकल चुकी हैं और जिनके शुरुआती कस्टमर भी बन चुके हैं। यह एक सोची-समझी रणनीति है, जहाँ वेंचर कैपिटल फर्म्स अब सिर्फ शुरुआती आइडियाज के बजाय साबित हो चुकी टेक्नोलॉजी वाली कंपनियों पर फोकस कर रही हैं।
सरकारी योजनाओं का सहारा
प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को सरकारी नीतियों का भी बड़ा सहारा मिला है। 'डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI)' स्कीम और महत्वाकांक्षी 'सेमिकॉन 2.0' प्रोग्राम, जिसके लिए ₹1,27,500 करोड़ का बजट रखा गया है, ने प्राइवेट निवेशकों के लिए रिस्क काफी कम कर दिया है। डिज़ाइन इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव्स देकर, सरकार ने एक ऐसा सपोर्ट सिस्टम बनाया है जो इन हाई-रिस्क और लॉन्ग-जेस्टेशन बिज़नेस में निवेशकों को बड़ी रकम लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां और जोखिम
अच्छे फंडिंग नंबर्स के बावजूद, इस सेक्टर में अभी भी कई बड़ी मुश्किलें हैं। सबसे बड़ा जोखिम 'कमर्शियलाइज़ेशन गैप' है। कई स्टार्टअप लैब में वर्किंग चिप डिज़ाइन तो बना लेते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए इसे तैयार करने में उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग बहुत ज़्यादा कैपिटल-इंटेंसिव है और इसमें हाई प्रिसिजन की ज़रूरत होती है। अगर स्टार्टअप के पास मजबूत सप्लाई चेन पार्टनर नहीं है या डिज़ाइन इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स पर खरा नहीं उतरता, तो देरी और लागत बढ़ने का खतरा रहता है।
इसके अलावा, वर्तमान तेजी सरकारी इंसेंटिव प्रोग्राम्स पर भी निर्भर है। अगर इन सब्सिडीज़ को लागू करने या बांटने में कोई देरी होती है, तो उन स्टार्टअप्स के कैश फ्लो पर असर पड़ सकता है जो अपने विस्तार के लिए इन पर निर्भर हैं। निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह सेक्टर कच्चे माल और एडवांस इक्विपमेंट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भर है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाता है।
आगे क्या देखना होगा?
इन स्टार्टअप्स के लिए अगला कदम कैपिटल जुटाने से आगे बढ़कर सस्टेनेबल रेवेन्यू जेनरेट करना होगा। निवेशक शायद कस्टमर ऑर्डर बुक, नए चिप डिज़ाइन की सफल टेप-आउट्स और सरकारी इंसेंटिव्स का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की क्षमता पर ध्यान देंगे। अब फोकस सिर्फ पैसा जुटाने से हटकर यह साबित करने पर है कि इंडियन चिप डिज़ाइन ग्लोबल स्केल पर मुकाबला कर सकता है।
