भारत का BPM सेक्टर अब लेबर-कॉस्ट मॉडल से हटकर पूरी तरह से AI-संचालित सेवाओं की ओर बढ़ रहा है। पारंपरिक 'आवरली बिलिंग' खत्म होने से मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह बदलाव नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।
बड़े बदलाव की आहट
भारतीय BPM इंडस्ट्री पिछले कई दशकों से 'लेबर आर्बिट्रेज' के मॉडल पर टिकी थी, जहां कंपनियों की ग्रोथ का सीधा मतलब ज्यादा कर्मचारियों की भर्ती करना होता था। लेकिन अब यह पूरी तरह से बदल रहा है। अब कंपनियां मैनपावर के बजाय AI-ऑर्केस्ट्रेटेड सेवाओं पर जोर दे रही हैं, ताकि सीधे काम के बदले 'इंटेलिजेंट ऑपरेशंस' दिए जा सकें।
रेवेन्यू मॉडल में आया बदलाव
परंपरागत रूप से, BPM कंपनियां 'Full-Time Equivalent' (FTE) यानी कर्मचारियों की संख्या के आधार पर बिलिंग करती थीं। अब AI के कारण इंसानी काम कम हो रहा है, जिससे कंपनियों के सामने 'रेवेन्यू कंप्रेशन' का खतरा मंडरा रहा है। इसी के चलते, अब कंपनियां 'आउटकम-बेस्ड' (परिणाम-आधारित) या 'रिस्क-शेयरिंग' प्राइसिंग पर शिफ्ट हो रही हैं, जहां भुगतान काम के घंटों के बजाय आउटपुट (जैसे बेहतर कस्टमर रिटेंशन या प्रोसेस की गति) पर निर्भर करेगा।
GCC और BPM की नई साझेदारी
ग्लोबल कंपनियों के 'Global Capability Centres' (GCCs) अब BPM फर्मों को केवल बैक-ऑफिस वेंडर नहीं मानते। अब उन्हें 'ट्रांसफॉर्मेशन ऑर्केस्ट्रेटर' के रूप में देखा जा रहा है। ये पार्टनर क्लाइंट की डिजिटल रणनीति को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
चुनौतियां और रिस्क
AI के साथ सबसे बड़ी समस्या उसकी अनिश्चितता है, जिसे ठीक करने के लिए कंपनियों को 'human-in-the-loop' मैकेनिज्म अपनाना पड़ रहा है। डेटा ऑडिट करने के लिए नई मैनपावर तैयार करना और गवर्नेंस फ्रेमवर्क बनाने का खर्च सीधे शॉर्ट-टर्म मार्जिन पर असर डाल रहा है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
Nasscom जैसे इंडस्ट्री बॉडीज के मुताबिक, लंबी अवधि में यह ग्रोथ काफी मजबूत बनी रह सकती है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी ऑपरेटिंग मार्जिन को कैसे स्टेबल रखती हैं और कितनी जल्दी आउटकम-बेस्ड प्राइसिंग को क्लाइंट्स के बीच लागू करवा पाती हैं।
