यूनियन कैबिनेट ने 'सेमिकॉन 2.0' के तहत ₹1.27 लाख करोड़ के बड़े पैकेज को मंजूरी दे दी है। इस पहल का मकसद सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित न रहकर, चिप डिजाइन, रिसर्च और जरूरी केमिकल जैसे क्षेत्रों में भारत की क्षमता बढ़ाना है, ताकि इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो सके।
सेमिकॉन 2.0: भारत की चिप रणनीति का नया अध्याय
केंद्र सरकार ने 'सेमिकॉन 2.0' प्रोजेक्ट के तहत ₹1.27 लाख करोड़ के एक बड़े फाइनेंशियल पैकेज को हरी झंडी दिखा दी है। यह भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति का एक महत्वपूर्ण विस्तार है। जहां 2021 में शुरू हुए इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (India Semiconductor Mission) का फोकस चिप फैब्रिकेशन और असेंबली पर था, वहीं अब इस नए चरण में पूरी एंड-टू-एंड डोमेस्टिक सप्लाई चेन बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
वैल्यू चेन का विस्तार
सेमिकॉन 2.0 अब चिप डिजाइन (Chip Design), रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) जनरेशन, खास इक्विपमेंट और अल्ट्रा-प्योर केमिकल्स जैसे कच्चे माल तक अपने दायरे को बढ़ा रहा है। इन अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम सेक्टर्स को सपोर्ट करके, सरकार भारत को ग्लोबल टेक्नोलॉजी में आगे ले जाने का लक्ष्य रख रही है। यह एक ऐसी रणनीतिक कोशिश है जो आज की हकीकत को संबोधित करती है, जहां भारत अपनी सेमीकंडक्टर की लगभग 90-95% जरूरतों के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है।
रणनीतिक और आर्थिक लक्ष्य
निवेशकों के लिए, यह पॉलिसी इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के प्रति सरकार की लॉन्ग-टर्म प्रतिबद्धता को दर्शाती है। सेमीकंडक्टर्स कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), डिफेंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे कई सेक्टर्स के लिए बेहद जरूरी हैं। एक लोकल इकोसिस्टम को बढ़ावा देकर, सरकार सप्लाई चेन को सुरक्षित करना चाहती है और लंबे समय में इंपोर्ट बिल को कम करने की उम्मीद करती है। नीति आयोग (Niti Aayog) ने 2035 तक $120-150 बिलियन की सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन बनाने का विजन रखा है, जिसका लक्ष्य उस समय तक $200 बिलियन तक पहुंचने वाले डोमेस्टिक मार्केट को सर्व करना है।
प्रतिस्पर्धी माहौल और जोखिम
हालांकि यह फंडिंग काफी बड़ी है, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अन्य देश अपने सेमीकंडक्टर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए इससे भी बड़े फंड्स आवंटित कर चुके हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और चीन ने ऐतिहासिक रूप से अपनी चिप क्षमताओं को मजबूत करने के लिए काफी अधिक पूंजी का निवेश किया है। भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती ताइवान और दक्षिण कोरिया के स्थापित ग्लोबल लीडर्स के मुकाबले लागत (Cost) और गुणवत्ता (Quality) दोनों पर प्रतिस्पर्धा करना होगा।
इसके अलावा, इस पहल की सफलता कई व्यावहारिक बाधाओं को दूर करने पर निर्भर करेगी। इनमें हाई-क्वालिटी पावर और अल्ट्रा-प्योर वॉटर की उपलब्धता शामिल है, जो सेमीकंडक्टर उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस सेक्टर में भाग लेने वाली कंपनियों को टैलेंट गैप को पाटना होगा और ऐसे कैपिटल को आकर्षित करना होगा जो धैर्यवान हो, क्योंकि इन प्रोजेक्ट्स में मुनाफे में आने से पहले अक्सर लंबे समय लगता है।
निवेशक आगामी सरकारी नोटिफिकेशन्स में डिज़ाइन-फोकस्ड स्टार्टअप्स और मटीरियल मैन्युफैक्चरर्स के लिए खास इंसेंटिव स्ट्रक्चर्स पर नज़र रख सकते हैं। इस सेक्टर का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कितनी प्रभावी ढंग से कॉम्प्लेक्स ग्लोबल सप्लाई चेन में एकीकृत हो पाती हैं और क्या वे इंटरनेशनल खरीदारों द्वारा आवश्यक सख्त परफॉर्मेंस और रिलायबिलिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा कर पाती हैं।
